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घोषणाओं को नहीं पहना सके अमली जामा
Lucknow
Updated Thu, 21 Feb 2013 05:30 AM IST
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लखनऊ। रेल बजट में घोषणाएं तो बड़ी-बड़ी हुईं लेकिन सब कागजी ही साबित हुईं। बीते वर्षों के रेल बजटों का लेखा जोखा देखा जाए तो कुछ ऐसी ही तस्वीर उभरती है। उदाहरण के तौर पर ‘लखनऊ स्टेशन वर्ल्ड क्लास होगा’, स्टेशन पर चौबीस घंटे डॉक्टर की सुविधा होगी’, प्लेटफार्म पर शुद्ध जल मुहैया होगा’, सचल वैन से ई टिकट जारी होगा।’ ये चंद ऐसी घोषणाएं हैं जो पूर्व में की गई थीं, लेकिन अभी तक धरातल पर नहीं उतर सकीं। और तो और बजट की घोषणाओं को अमली जामा पहनाने के लिये रेलवे प्रशासन द्वारा भी कोई प्रयास नहीं किये जा रहे है। स्थिति यह है कि पांच वर्ष पहले की गई कुछ घोषणाओं को अब रेल मंत्रालय स्वीकृति दे रहा है। ऐसे में कौन सा कार्य पहले कराया जाए? रेलवे अधिकारियों को यह समझ में नहीं आ रहा। यात्री सुविधाएं ही नहीं रेल कर्मियों को मिलने वाली सुविधाएं भी सुस्त गति से कार्य रही हैं। वहीं बजट की राशि हर साल महंगाई के साथ बढ़ती जा रही है।
घोषणाओं को अमल में लाने में हो रही देरी का परिणाम है कि कहीं बजट की कमी सामने आती है तो कहीं इंफ्रास्ट्रक्चर की कमी। लखनऊ के बारे में ही देखें तो यहां न मेडिकल कालेज खुला और न नर्सिंग होम। दोनों घोषणाएं हुई थीं। इसी तरह बुजुर्ग व अक्षम यात्रियों के लिये बैटरी चलित कारें चलाने, स्टेशन पर चौबीसों घंटे डाक्टर की सुविधा उपलब्ध कराने, दुरुंतो में डाक्टर की सुविधा मिलने व प्लेटफार्म पर शुद्ध जल रेलवे मुहैया कराने की भी योजनाएं हाशिए पर हैं। यही कारण है कि अब हर तरफ कहा जा रह है कि रेल बजट में होने वाली घोषणाएं हवा हवाई साबित हो रही हैं।
उक्त केअलावा बात अगर विकास कार्यों की हो तो इसका अंदाजा भी उत्तर रेलवे लखनऊ मंडल व पूर्वोत्तर रेलवे लखनऊ मंडल के स्टेशनों को देखकर लगाया जा सकता है। पिछले पांच साल में यहां न तो विद्युतीकरण कार्य में तेजी आई और न ही नई रेल लाइन बिछाने में। उल्टे ट्रेनों की तुलना में यात्रियों का ग्राफ जरूर अठारह से बीस फीसदी के आसपास बढ़ गया। इसी तरह रेलमंत्री ने घोषणा की थी कि यात्री व लीज होल्डर अपने ट्रेनों की सही स्थिति अब मोबाइल से जान सकेंगे। लेकिन यह सपना अभी तक पूरी तरह से साकार नहीं हो सका है। आउटर पर खड़ी यात्री ट्रेन की सही स्थिति जानने के लिये रेलवे के पास कोई ठोस आधार नहीं है। माल डिब्बों का पता लगाने के लिये ‘आरएफडी’ प्रौद्योगिकी भी सही से काम नहीं कर रही है। ई टिकट जारी करने के लिये सचल वैन की शुरुआत आज तक सपना बना हुआ है। आज भी मलिहाबाद के यात्री को लखनऊ आकर टिकट कराना पड़ता है। वहीं पूर्वोत्तर रेलवे लखनऊ मंडल में कैब वे के अलावा कोई विकास कार्य नहीं हुआ।
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घोषणाओं को अमल में लाने में हो रही देरी का परिणाम है कि कहीं बजट की कमी सामने आती है तो कहीं इंफ्रास्ट्रक्चर की कमी। लखनऊ के बारे में ही देखें तो यहां न मेडिकल कालेज खुला और न नर्सिंग होम। दोनों घोषणाएं हुई थीं। इसी तरह बुजुर्ग व अक्षम यात्रियों के लिये बैटरी चलित कारें चलाने, स्टेशन पर चौबीसों घंटे डाक्टर की सुविधा उपलब्ध कराने, दुरुंतो में डाक्टर की सुविधा मिलने व प्लेटफार्म पर शुद्ध जल रेलवे मुहैया कराने की भी योजनाएं हाशिए पर हैं। यही कारण है कि अब हर तरफ कहा जा रह है कि रेल बजट में होने वाली घोषणाएं हवा हवाई साबित हो रही हैं।
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उक्त केअलावा बात अगर विकास कार्यों की हो तो इसका अंदाजा भी उत्तर रेलवे लखनऊ मंडल व पूर्वोत्तर रेलवे लखनऊ मंडल के स्टेशनों को देखकर लगाया जा सकता है। पिछले पांच साल में यहां न तो विद्युतीकरण कार्य में तेजी आई और न ही नई रेल लाइन बिछाने में। उल्टे ट्रेनों की तुलना में यात्रियों का ग्राफ जरूर अठारह से बीस फीसदी के आसपास बढ़ गया। इसी तरह रेलमंत्री ने घोषणा की थी कि यात्री व लीज होल्डर अपने ट्रेनों की सही स्थिति अब मोबाइल से जान सकेंगे। लेकिन यह सपना अभी तक पूरी तरह से साकार नहीं हो सका है। आउटर पर खड़ी यात्री ट्रेन की सही स्थिति जानने के लिये रेलवे के पास कोई ठोस आधार नहीं है। माल डिब्बों का पता लगाने के लिये ‘आरएफडी’ प्रौद्योगिकी भी सही से काम नहीं कर रही है। ई टिकट जारी करने के लिये सचल वैन की शुरुआत आज तक सपना बना हुआ है। आज भी मलिहाबाद के यात्री को लखनऊ आकर टिकट कराना पड़ता है। वहीं पूर्वोत्तर रेलवे लखनऊ मंडल में कैब वे के अलावा कोई विकास कार्य नहीं हुआ।
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