{"_id":"124-52514","slug":"Lucknow-52514-124","type":"story","status":"publish","title_hn":" ‘एचपीवी वैक्सीन पूरी तरह सुरक्षित’","category":{"title":"City & states","title_hn":"शहर और राज्य","slug":"city-and-states"}}
‘एचपीवी वैक्सीन पूरी तरह सुरक्षित’
Lucknow
Updated Wed, 13 Feb 2013 05:30 AM IST
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लखनऊ। ‘ह्यूमन पेपिलोमा वायरस (एचपीवी) के लिए बनी वैक्सीन के भारत में ट्रायल को लेकर मुझे कोई जानकारी नहीं है। इन वैक्सीनों से खतरे की जो बातें कही जा रही हैं, वे महज अटकलें हैं। यह पूरी तरह सुरक्षित है।’ यह कहना है नोबेल पुरस्कार प्राप्त प्रो. हेराल्ड जुर हाउजन का। वे मंगलवार को एरा लखनऊ मेडिकल कॉलेज में आयोजित नेशनल कॉन्फ्रेंस ‘एडवांसेस इन कैंसर रिसर्च’ और ‘सिंपोजियम ऑन सर्वाइकल कैंसर-ऑन्को 2013’ में शामिल होने आए थे। इस मौके पर उन्हाेंने संवाददाताओं से बातचीत के दौरान अपने काम के बारे में बताया। ‘अमर उजाला’ की ओर से भारत में इस वैक्सीन के ट्रायल के बारे में पूछे जाने पर प्रो. हाउजन ने इससे पूरी तरह अनभिज्ञता जताई। उन्हें बताया गया कि वैक्सीनेशन की वजह से कम उम्र की लड़कियों में बांझपन जैसी समस्याएं आई हैं। इन ट्रायल के तरीकों और औचित्य से लेकर वैक्सीन तक पर दुनियाभर के वैज्ञानिक सवाल उठा रहे हैं और खुद भारत सरकार को ट्रायल बंद कराने पड़े हैं। इस पर प्रो. हाउजन का कहना था कि अपने शोध में उन्हाेंने इस वैक्सीन को सर्वाइकल कैंसर में उपयोगी पाया है। वे वैक्सीन पर किसी तरह के आरोपों को सही नहीं मानते। उन्होंने वैक्सीन से होने वाले खतरे के दूसरे वैज्ञानिकों के इन दावों को अटकलों पर आधारित बताया। प्रो. हाउजन ने कहा कि कुछ देशों में वैक्सीनेशन से बच्चों में ऑटिज्म बढ़ने की बात भी कही गई है लेकिन ये भी अटकलों पर आधारित है। प्रो. हाउजन ने इस वैक्सीनेशन को लड़कियों ही नहीं बल्कि लड़कों के लिए भी जरूरी बताया है। उनका तर्क था कि शारीरिक संबंध बनाने के दौरान यह युवाओं में फैल सकता है।
मामला : वैक्सीन और हम पर ट्रायल
वैक्सीन : वेजाइनल सर्वाइकल कैंसर में एचपीवी की भूमिका पर 80 के दशक में प्रो. हाउजन द्वारा किए गए काम के बाद एचपीवी वैक्सीन तैयार की गई थीं। फिलहाल एच16 और एच18 नामक इन वैक्सीन का उपयोग हो रहा है।
ट्रायल : दवा कंपनियों और गैर सरकारी संगठनों ने सरकार से मिलकर अनैतिक तौर पर आंध्रप्रदेश व गुजरात के जनजातीय क्षेत्रों की करीब 23 हजार लड़कियों पर ट्रायल करवाए। दावा किया गया कि वैक्सीन पूरी तरह सुरक्षित है। इसे लगवाने के बाद भारतीय लड़कियों में सर्वाइकल कैंसर नहीं होगा।
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और सामने आया : वैक्सीनेशन के तुरंत बाद 14 से 18 साल की लड़कियों में बांझपन से लेकर मौत तक की घटनाएं सामने आईं। हालांकि, इन मौतों की पुख्ता वजह स्पष्ट नहीं हो सकी।
विरोध : दुनियाभर के वैज्ञानिकों के एक बड़े तबके ने भारतीय लड़कियों पर हुए इन ट्रायल्स को ‘गिनी-पिग’ पर होने वाले ट्रायल सरीखा बताते हुए अनैतिक करार दिया। 2010 में केंद्र सरकार ने इन ट्रायल्स पर तुरंत रोक लगवाई।
तर्क : जर्नल ऑफ रॉयल सोसाइटी ऑफ मेडिसिन के जून 2012 के अंक में क्वीन मैरी यूनिवर्सिटी, लंदन व एडिनबर्ग यूनिवर्सिटी के वैज्ञानिकों का कहना था कि इन वैक्सीन का सर्वाइकल कैंसर रोकने का कोई सुबूत नहीं मिला है। ऐसे में भारत में ये ट्रायल्स नहीं होने चाहिए थे। वैज्ञानिक प्रो. एलिसन पोलक और उनकी टीम के अनुसार भारतीय महिलाओं में ब्राजील, जिम्बाब्वे या अन्य विकासशील देशों की तरह सर्वाइकल कैंसर नहीं पनपा है। 1983 तक एक लाख महिलाओं में औसतन 43 को यह बीमारी होती थी और 2005 तक यह संख्या 22 रह गई।
वजह : विभिन्न रेडिकल संगठनों ने इन ट्रायल्स को बड़ी फार्मा कंपनियों, चिकित्सकों और सरकारों की साठगांठ का नतीजा बताया, जिनमें हजारों लड़कियों का जीवन दांव पर लगा दिया गया।
विवाद : 2008 में प्रो. हाउजन को नोबेल मिला। हालांकि, विवाद उपजा कि मेडिसिन की नोबेल प्राइज सलेक्शन समिति में दो सदस्य उसी फार्मा कंपनी से ताल्लुक रखने वाले थे जो एचवीपी वैक्सीन की सबसे बड़ी निर्माता है।
और आज : ट्रायल हालांकि रोके जा चुके हैं लेकिन ये वैक्सीनेशन देश में आज भी वैध है।
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मामला : वैक्सीन और हम पर ट्रायल
वैक्सीन : वेजाइनल सर्वाइकल कैंसर में एचपीवी की भूमिका पर 80 के दशक में प्रो. हाउजन द्वारा किए गए काम के बाद एचपीवी वैक्सीन तैयार की गई थीं। फिलहाल एच16 और एच18 नामक इन वैक्सीन का उपयोग हो रहा है।
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ट्रायल : दवा कंपनियों और गैर सरकारी संगठनों ने सरकार से मिलकर अनैतिक तौर पर आंध्रप्रदेश व गुजरात के जनजातीय क्षेत्रों की करीब 23 हजार लड़कियों पर ट्रायल करवाए। दावा किया गया कि वैक्सीन पूरी तरह सुरक्षित है। इसे लगवाने के बाद भारतीय लड़कियों में सर्वाइकल कैंसर नहीं होगा।
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और सामने आया : वैक्सीनेशन के तुरंत बाद 14 से 18 साल की लड़कियों में बांझपन से लेकर मौत तक की घटनाएं सामने आईं। हालांकि, इन मौतों की पुख्ता वजह स्पष्ट नहीं हो सकी।
विरोध : दुनियाभर के वैज्ञानिकों के एक बड़े तबके ने भारतीय लड़कियों पर हुए इन ट्रायल्स को ‘गिनी-पिग’ पर होने वाले ट्रायल सरीखा बताते हुए अनैतिक करार दिया। 2010 में केंद्र सरकार ने इन ट्रायल्स पर तुरंत रोक लगवाई।
तर्क : जर्नल ऑफ रॉयल सोसाइटी ऑफ मेडिसिन के जून 2012 के अंक में क्वीन मैरी यूनिवर्सिटी, लंदन व एडिनबर्ग यूनिवर्सिटी के वैज्ञानिकों का कहना था कि इन वैक्सीन का सर्वाइकल कैंसर रोकने का कोई सुबूत नहीं मिला है। ऐसे में भारत में ये ट्रायल्स नहीं होने चाहिए थे। वैज्ञानिक प्रो. एलिसन पोलक और उनकी टीम के अनुसार भारतीय महिलाओं में ब्राजील, जिम्बाब्वे या अन्य विकासशील देशों की तरह सर्वाइकल कैंसर नहीं पनपा है। 1983 तक एक लाख महिलाओं में औसतन 43 को यह बीमारी होती थी और 2005 तक यह संख्या 22 रह गई।
वजह : विभिन्न रेडिकल संगठनों ने इन ट्रायल्स को बड़ी फार्मा कंपनियों, चिकित्सकों और सरकारों की साठगांठ का नतीजा बताया, जिनमें हजारों लड़कियों का जीवन दांव पर लगा दिया गया।
विवाद : 2008 में प्रो. हाउजन को नोबेल मिला। हालांकि, विवाद उपजा कि मेडिसिन की नोबेल प्राइज सलेक्शन समिति में दो सदस्य उसी फार्मा कंपनी से ताल्लुक रखने वाले थे जो एचवीपी वैक्सीन की सबसे बड़ी निर्माता है।
और आज : ट्रायल हालांकि रोके जा चुके हैं लेकिन ये वैक्सीनेशन देश में आज भी वैध है।