कामयाबी: जल्द ही लॉन्च होंगे 6G सेमीकंडक्टर, बिना ट्रैफिक जाम चलेंगी ऑटोमैटिक कारें
दरअसल, आर्टिफिशियल इंटेलीजेंस और मशीन लर्निंग की भविष्य की अवधारणाएं इस बात पर निर्भर हैं कि हम वर्तमान नेटवर्क की तुलना में डेटा की कितनी बड़ी मात्रा को कितनी तेजी से संचारित और स्थानांतरित कर पाते हैं। ब्रिस्टल विश्वविद्यालय के वैज्ञानिकों ने इसी प्रक्रिया को तेज करने का एक अभिनव तरीका खोज निकाला है, जो 6जी टेक्नोलॉजी का आधार बन सकता है।

विस्तार
ब्रिटेन के वैज्ञानिकों ने अगली पीढ़ी की सेमीकंडक्टर तकनीक खोज ली है। यह 6जी पर आधारित भविष्य की अवधारणाओं को साकार करने में अहम भूमिका निभा सकती है। सड़क पर बिना ट्रैफिक जाम सिर्फ स्वचालित कारें चल रही हों, आप दूर रह रहे प्रियजनों को देखने के साथ स्पर्श भी कर पा रहे हों और बीमार पड़ने पर घर में ही तुरंत स्वास्थ्य परीक्षण तथा उपचार भी शुरू हो जाए, तो ये आपको किसी साइंस फिक्शन जैसा लगेगा! लेकिन ये सब असल में ही निकट भविष्य की संभावनाएं हैं, जो अगली जेनरेशन के सेमीकंडक्टर विकसित करने में मिली क्रांतिकारी सफलता के बाद सच हो सकती हैं। सेमीकंडक्टर तकनीक की गुत्थी सुलझाने वाला यह शोध ‘नेचर इलेक्ट्रॉनिक्स’ जर्नल में प्रकाशित हुआ है और इसे अंजाम दिया है ब्रिटेन के ब्रिस्टल विश्वविद्यालय के वैज्ञानिकों ने।
दरअसल, आर्टिफिशियल इंटेलीजेंस और मशीन लर्निंग की भविष्य की अवधारणाएं इस बात पर निर्भर हैं कि हम वर्तमान नेटवर्क की तुलना में डेटा की कितनी बड़ी मात्रा को कितनी तेजी से संचारित और स्थानांतरित कर पाते हैं। ब्रिस्टल विश्वविद्यालय के वैज्ञानिकों ने इसी प्रक्रिया को तेज करने का एक अभिनव तरीका खोज निकाला है, जो 6जी टेक्नोलॉजी का आधार बन सकता है।
यह सर्वविदित है कि 5जी से 6जी नेटवर्क में बदलाव आसान नहीं है। इसके लिए सेमीकंडक्टर टेक्नोलॉजी, सर्किट, सिस्टम और एल्गोरिदम में व्यापक स्तर पर क्रांतिकारी तकनीकी उन्नयन की आवश्यकता होगी। वर्तमान में प्रचलित सेमीकंडकर गैलियम नाइट्राइड की क्षमता आज की तुलना में अत्यधिक तेज और शक्तिशाली होनी चाहिए। यही काम वैज्ञानिकों की शोध टीम ने किया है।
गैलियम नाइट्राइड की क्षमता बढ़ाने के लिए वैज्ञानिकों ने सुपरलैटिस कैस्टेलैटेड फील्ड इफेक्ट ट्रांजिस्टर को नए सिरे से डिजाइन किया, जिसमें एक हजार से अधिक सौ नैनोमीटर चौड़ाई वाले फिन्स (पंख) का उपयोग होता है। इन फिन्स के जरिए इलेक्ट्रॉन का प्रवाह अत्यधिक तेज हो जाता है, जिससे 75 से 110 गीगाहर्ट्ज के डब्ल्यू-बैंड में कई गुना तेज प्रदर्शन देखने को मिलता है। इससे गैलियम नाइट्राइड में लैच इफेक्ट की पहचान हुई, जो पहले कभी नहीं की गई थी।