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रक्षाबंधन की पौराणिक कथाएं: मां लक्ष्मी जी से लेकर द्रौपदी तक, इन कथाओं से जुड़ा है रक्षाबंधन का पर्व

Fri, 28 Aug 2026 05:52 AM IST
विनोद शुक्ला धर्म डेस्क, अमर उजाला
धर्म डेस्क, अमर उजाला Published by: विनोद शुक्ला Updated Fri, 28 Aug 2026 05:52 AM IST
सार

हिंदू धर्म में रक्षाबंधन एक प्रमुख त्योहार होता है। रक्षाबंधन को लेकर कई तरह की प्रचलित कथाएं हैं। आइए जानते हैं रक्षाबंधन से जुड़ी पौराणिक कथाएं। 
 

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Raksha Bandhan 2026 Why We Celebrate Rakhi Know History Origin Mythological Stories
Raksha Bandhan 2026: रक्षाबंधन की कथाएं - फोटो : अमर उजाला

विस्तार

Raksha Bandhan 2026: 28 अगस्त को देशभर में रक्षाबंधन का पर्व मनाया जाएगा। धार्मिक मान्यता के अनुसार रक्षाबंधन पर शुभ मुहूर्त और भद्रारहित काल में रक्षा सूत्र बांधना विशेष फलदायी माना गया है। कहा जाता है कि विधिपूर्वक बांधा गया रक्षा सूत्र भाई के जीवन में विजय और कार्यसिद्धि का मार्ग प्रशस्त करता है। रक्षाबंधन केवल भाई-बहन के प्रेम का पर्व ही नहीं, बल्कि इसके साथ कई ऐसी पौराणिक कथाएं जुड़ी हैं, जो इस पर्व के धार्मिक महत्व को भी दर्शाती हैं।

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लक्ष्मीजी ने बलि को बांधी राखी, ऐसे वापस आए विष्णु
शास्त्रों के अनुसार असुरों के राजा बलि ने अपने बल और पराक्रम से तीनों लोकों पर अधिकार कर लिया था। राजा बलि के इस पराक्रम को देखकर स्वर्ग के राजा इंद्रदेव घबरा गए और भगवान विष्णु के पास मदद मांगने पहुंचे। इंद्र की प्रार्थना स्वीकार कर भगवान विष्णु ने वामन अवतार धारण किया और राजा बलि से भिक्षा मांगने पहुंच गए। वामन भगवान ने दानवीर बलि से तीन पग भूमि मांगी। अपने पहले और दूसरे पग में भगवान ने धरती और आकाश नाप लिया। इसके बाद तीसरा पग रखने के लिए कुछ बचा नहीं तो राजा बलि ने तीसरा पग अपने सिर पर रखने के लिए कहा। भगवान वामन ने ऐसा ही किया। इस तरह देवताओं की दुविधा समाप्त हो गई और भगवान राजा बलि के दान से प्रसन्न हुए।
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उन्होंने राजा बलि से वरदान मांगने को कहा तो बलि ने उनसे पाताल में बसने का वर मांग लिया। राजा की इच्छा पूरी करने के लिए भगवान विष्णु को पाताल जाना पड़ा। इससे सभी देवतागण और माता लक्ष्मी चिंतित हो गए। अपने पति को वापस लाने के लिए माता लक्ष्मी ने गरीब स्त्री का रूप धारण किया और राजा बलि के पास पहुंचकर उन्हें अपना भाई बनाया। इसके बाद उन्होंने बलि की कलाई पर राखी बांधी और बदले में भगवान विष्णु को पाताल लोक से ले जाने का वचन मांग लिया। उस दिन श्रावण मास की पूर्णिमा थी और माना जाता है कि तभी से रक्षाबंधन मनाने की परंपरा शुरू हुई।
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रक्षा सूत्र ने दिलाई देवताओं को दानवों पर विजय
भविष्य पुराण के अनुसार एक बार देवताओं और दानवों के बीच 12 वर्षों तक युद्ध हुआ, लेकिन देवताओं को विजय नहीं मिल सकी। इंद्रदेव अपनी हार के डर से दुखी होकर देवगुरु बृहस्पति के पास गए। उनके सुझाव पर इंद्र की पत्नी महारानी शची ने श्रावण शुक्ल पूर्णिमा के दिन विधि-विधान के साथ व्रत करके रक्षा सूत्र तैयार किया। इसके बाद उन्होंने इंद्र की दाहिनी कलाई में रक्षा सूत्र बांधा। मान्यता है कि इसके बाद देवताओं ने दानवों पर विजय प्राप्त की। तभी से विजय की कामना और रक्षा के भाव से रक्षा सूत्र बांधने की परंपरा शुरू हुई।

द्रौपदी की पट्टी का ऋण श्रीकृष्ण ने चुकाया
शास्त्रों में भगवान श्रीकृष्ण और द्रौपदी का एक भावपूर्ण प्रसंग भी मिलता है। जब कृष्ण ने सुदर्शन चक्र से शिशुपाल का वध किया, तब उनकी अंगुली में चोट लग गई। द्रौपदी ने उसी समय अपनी साड़ी का एक टुकड़ा फाड़कर उनकी अंगुली पर पट्टी की तरह बांध दिया। यह श्रावण मास की पूर्णिमा का दिन बताया जाता है। इसके बाद श्रीकृष्ण ने भी द्रौपदी को बहन का स्नेह दिया और चीरहरण के समय उनकी लाज बचाकर भाई का धर्म निभाया। इस प्रसंग को भाई-बहन के प्रेम, विश्वास और एक-दूसरे के प्रति रक्षा भाव का प्रतीक माना जाता है।


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डिस्क्लेमर (अस्वीकरण): यहां दी गई जानकारी सामान्य मान्यताओं, ज्योतिष, पंचांग, धार्मिक ग्रंथों आदि पर आधारित है। यहां दी गई सूचना और तथ्यों की सटीकता, संपूर्णता के लिए अमर उजाला उत्तरदायी नहीं है। 

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