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पहल: ग्लेशियर से 500 मीटर दूर बन रही विश्व की सबसे ऊंची डबल लेन टनल, आसान होगी शिंकुला टनल से कारगिल-लेह पहुंच
Fri, 14 Aug 2026 01:02 PM IST
दुष्यंत शर्मा
अशोक राणा, केलांग (लाहौल-स्पीति)
अशोक राणा, केलांग (लाहौल-स्पीति)
Published by: दुष्यंत शर्मा
Updated Fri, 14 Aug 2026 01:02 PM IST
सार
लाहौल-स्पीति के शिंकुला दर्रे में समुद्रतल से 15,400 फीट की ऊंचाई पर 4.1 किलोमीटर लंबी डबललेन टनल का निर्माण चल रहा है। सुरंग शिंकुला ग्लेशियर से करीब 500 मीटर दूर है। ऑक्सीजन की कमी और कठिन मौसम के बीच इंजीनियर व कामगार शिफ्टों में काम कर रहे हैं। परियोजना पूरी होने के बाद मनाली-लेह संपर्क को नया विकल्प मिलेगा और प्रस्तावित मार्ग की दूरी करीब 100 किलोमीटर तक घट सकती है।
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सांकेतिक चित्र
- फोटो : अमर उजाला
विस्तार
हिमालय की बेहद कठिन भौगोलिक परिस्थितियों के बीच लाहौल-स्पीति के शिंकुला दर्रे में एक ऐसी सुरंग तैयार की जा रही है, जो ऊंचाई के मामले में दुनिया की सबसे महत्वपूर्ण डबल ट्रैफिक टनल में शामिल होगी। समुद्रतल से करीब 15,400 फीट की ऊंचाई पर बन रही यह 4.1 किलोमीटर लंबी डबललेन सुरंग शिंकुला ग्लेशियर से लगभग 500 मीटर की दूरी पर है।
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इतनी ऊंचाई पर निर्माण अपने आप में बड़ी चुनौती है। यहां कम ऑक्सीजन, अत्यधिक ठंड और दुर्गम पहाड़ी भूभाग के बीच इंजीनियरों और श्रमिकों को काम करना पड़ रहा है। ऑक्सीजन की कमी के चलते निर्माण गतिविधियों को अलग-अलग शिफ्ट में संचालित किया जा रहा है।
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सेना के लिए भी रणनीतिक रूप से अहम
शिंकुला टनल को केवल सड़क संपर्क परियोजना के तौर पर नहीं देखा जा रहा है। इसके सामरिक महत्व को देखते हुए परियोजना को बेहद अहम माना जा रहा है। सुरंग बनने के बाद भारतीय सेना के लिए सीमावर्ती और अग्रिम इलाकों तक पहुंच पहले के मुकाबले आसान और तेज हो सकती है। परियोजना पर करीब 1,600 करोड़ रुपये खर्च होने का अनुमान है। निर्माण कंपनी के प्रोजेक्ट इंचार्ज विक्रम सिंह के अनुसार, ऊंचाई और कठिन भौगोलिक परिस्थितियों के कारण काम चुनौतीपूर्ण है, लेकिन निर्माण लगातार जारी है।
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मनाली से लेह का सफर करीब 100 किलोमीटर घटेगा
वर्तमान में बारालाचा दर्रे के रास्ते मनाली से लेह की दूरी करीब 427 किलोमीटर है। वहीं शिंकुला होकर यह दूरी लगभग 440 किलोमीटर बैठती है। शिंकुला टनल के निर्माण के बाद प्रस्तावित मार्ग में करीब 100 किलोमीटर की कमी आने की उम्मीद है और दूरी लगभग 330 किलोमीटर रह जाएगी। इससे लाहौल-स्पीति के साथ लेह-लद्दाख और कारगिल क्षेत्र के बीच सड़क संपर्क को भी मजबूती मिलेगी।
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टनल के दोनों सिरों से दिखता है ग्लेशियर
शिंकुला टनल की एक खासियत इसका प्राकृतिक परिवेश भी है। सुरंग के दक्षिणी और उत्तरी पोर्टल के आसपास शिंकुला ग्लेशियर मौजूद है। यहां मोटी बर्फ की परतें टनल के दोनों पोर्टल से नजदीक से देखी जा सकती हैं। टनल के निर्माण के बाद यह इलाका पर्यटन की दृष्टि से भी आकर्षण का नया केंद्र बन सकता है। शिंकुला दर्रा और आसपास का ग्लेशियर पर्यटकों के लिए हिमालयी प्राकृतिक दृश्यों का नया डेस्टिनेशन बनने की क्षमता रखता है।
मनाली-लेह के लिए बनेगा वैकल्पिक संपर्क मार्ग
शिंकुला टनल के पूरा होने के बाद मनाली से लेह और कारगिल तक पहुंचने के लिए एक वैकल्पिक मार्ग विकसित होगा। मौजूदा मनाली-लेह मार्ग में रोहतांग के अलावा बारालाचा, नाकिला, लाचुंगला और तंगलंगला जैसे ऊंचे दर्रों से होकर गुजरना पड़ता है। शिंकुला में सुरंग बनने से इन कठिन दर्रों पर निर्भरता कम होगी और मनाली-शिंकुला-कारगिल कॉरिडोर को वैकल्पिक संपर्क के रूप में विकसित करने में मदद मिलेगी। सबसे अहम बात यह है कि सुरंग के कारण इस मार्ग पर सालभर आवाजाही की संभावना बढ़ेगी।
शिंकुला टनल की एक खासियत इसका प्राकृतिक परिवेश भी है। सुरंग के दक्षिणी और उत्तरी पोर्टल के आसपास शिंकुला ग्लेशियर मौजूद है। यहां मोटी बर्फ की परतें टनल के दोनों पोर्टल से नजदीक से देखी जा सकती हैं। टनल के निर्माण के बाद यह इलाका पर्यटन की दृष्टि से भी आकर्षण का नया केंद्र बन सकता है। शिंकुला दर्रा और आसपास का ग्लेशियर पर्यटकों के लिए हिमालयी प्राकृतिक दृश्यों का नया डेस्टिनेशन बनने की क्षमता रखता है।
मनाली-लेह के लिए बनेगा वैकल्पिक संपर्क मार्ग
शिंकुला टनल के पूरा होने के बाद मनाली से लेह और कारगिल तक पहुंचने के लिए एक वैकल्पिक मार्ग विकसित होगा। मौजूदा मनाली-लेह मार्ग में रोहतांग के अलावा बारालाचा, नाकिला, लाचुंगला और तंगलंगला जैसे ऊंचे दर्रों से होकर गुजरना पड़ता है। शिंकुला में सुरंग बनने से इन कठिन दर्रों पर निर्भरता कम होगी और मनाली-शिंकुला-कारगिल कॉरिडोर को वैकल्पिक संपर्क के रूप में विकसित करने में मदद मिलेगी। सबसे अहम बात यह है कि सुरंग के कारण इस मार्ग पर सालभर आवाजाही की संभावना बढ़ेगी।