शिमला: विक्रमादित्य बोले- वीरभद्र सिंह ने शुरू की थी बीबीएमबी में हिस्सेदारी की लड़ाई, अब मिला अधिकार
लोक निर्माण मंत्री विक्रमादित्य सिंह ने कहा कि इस कानूनी संघर्ष की शुरुआत वर्ष 1996 में पूर्व मुख्यमंत्री वीरभद्र सिंह के नेतृत्व में हुई थी। पंजाब पुनर्गठन अधिनियम, 1966 के तहत हिमाचल के अधिकारों को लेकर कानूनी लड़ाई शुरू की गई थी।
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भाखड़ा ब्यास प्रबंधन बोर्ड (बीबीएमबी) में हिमाचल प्रदेश की हिस्सेदारी को लेकर सुप्रीम कोर्ट का फैसला प्रदेश के लिए ऐतिहासिक जीत है। लोक निर्माण मंत्री विक्रमादित्य सिंह ने कहा कि इस कानूनी संघर्ष की शुरुआत वर्ष 1996 में पूर्व मुख्यमंत्री वीरभद्र सिंह के नेतृत्व में हुई थी। पंजाब पुनर्गठन अधिनियम, 1966 के तहत हिमाचल के अधिकारों को लेकर कानूनी लड़ाई शुरू की गई थी। वर्ष 2011 में सुप्रीम कोर्ट ने प्रदेश की हिस्सेदारी के अधिकार को स्वीकार किया था, लेकिन वास्तविक हिस्से और लंबित बिजली लाभों का निर्धारण नहीं हो पाया था। अब ताजा फैसले से प्रदेश को उसका हक मिलने का रास्ता साफ हुआ है। प्रेसवार्ता में विक्रमादित्य सिंह ने इस सफलता का श्रेय मुख्यमंत्री सुखविंद्र सिंह सुक्खू के नेतृत्व में वर्तमान सरकार की प्रभावी पैरवी को भी दिया।
उन्होंने कहा कि भाखड़ा-नंगल, पौंग बांध और ब्यास नदी पर बनी अन्य परियोजनाओं के कारण बिलासपुर समेत प्रदेश के कई क्षेत्रों के लोगों को विस्थापन का दर्द झेलना पड़ा। कई परिवारों को राजस्थान और हरियाणा में बसाया गया, लेकिन उनके अनेक अधिकार और मांगें आज भी लंबित हैं। सरकार इन मुद्दों को भी कानूनी और प्रशासनिक स्तर पर उठाएगी। चंडीगढ़ में हिमाचल की हिस्सेदारी सहित अन्य अंतरराज्यीय मुद्दों पर भी प्रदेश अपने अधिकारों की लड़ाई जारी रखेगा।
उद्योग मंत्री बोले, मुख्यमंत्री सुक्खू की मजबूत पैरवी से मिली बड़ी जीत
शिमला। बीबीएमबी से जुड़े बकाया बिजली हिस्से के मामले में सुप्रीम कोर्ट के फैसले को प्रदेश सरकार ने बड़ी जीत बताया है। उद्योग मंत्री हर्षवर्धन चौहान ने दावा किया कि इससे हिमाचल को हर साल 600 से 1000 करोड़ रुपये तक की अतिरिक्त आय होगी। शुक्रवार को सचिवालय में प्रेसवार्ता के दौरान चौहान ने कहा कि बीबीएमबी परियोजनाओं में हिमाचल की बिजली हिस्सेदारी का अधिकार पहले से तय था, लेकिन पिछले 30 से 40 वर्षों के बकाये को लेकर विवाद चल रहा था। इस संबंध में वर्ष 1996 में सुप्रीम कोर्ट में मामला दायर किया गया था। वर्ष 2011 से प्रदेश को नियमित हिस्सेदारी मिलनी शुरू हुई। अब शीर्ष अदालत के फैसले से पुराने बकाये का लाभ मिलने का रास्ता साफ हुआ है। उन्होंने इस सफलता का श्रेय मुख्यमंत्री सुखविंद्र सिंह सुक्खू की मजबूत कानूनी पैरवी और रणनीति को दिया। कहा कि केंद्र के स्तर पर भी लगातार मामला उठाया गया और देश के बड़े वकीलों की सेवाएं ली गईं। चौहान ने कहा कि किशाऊ बांध परियोजना का खर्च पांच साझेदार राज्यों में बांटने पर सहमति बनने से हिमाचल को 3 से 4 हजार करोड़ रुपये के संभावित वित्तीय बोझ से राहत मिली है। उन्होंने नेता प्रतिपक्ष जयराम ठाकुर पर निशाना साधते हुए कहा कि मौजूदा सरकार ने प्रदेश के हितों से जुड़े इन मामलों को गंभीरता से आगे बढ़ाया है। वाइल्ड फ्लावर हॉल मामले में समझौते से भी प्रदेश को करीब 400 करोड़ रुपये मिले हैं। सरकार का लक्ष्य वर्ष 2032 तक हिमाचल को आत्मनिर्भर बनाना है।