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...तो क्या टूट रहा है आस्था के प्रति विश्वास!
धर्मेंद्र बोज्ञाटो/ अमर उजाला, रामपुर बुशहर
Updated Thu, 13 Nov 2014 12:20 PM IST
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इसे आस्था के प्रति टूटता विश्वास कहें या फिर कुछ और। अंतरराष्ट्रीय लवी मेले में बेचने के लिए लाए गए देवालयों में प्रयुक्त किए जाने वाले वाद्ययंत्रों की कोई टोह नहीं ले रहा है।
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इसके व्यापारी दिन भर ग्राहकों की राह ताकते रहते हैं और शाम को मायूसी के साथ कारोबार समेटना पड़ता है। वाद्य यंत्रों के प्रति उपेक्षित रवैये के चलते इसका शून्य की तरफ जा रहा है।
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बदलते परिवेश में लोगों का देवालयों में प्रयुक्त किए जाने वाले वाद्ययंत्रों के प्रति रुझान कम होने लगा है। इसका ताजा उदाहरण लवी मेले में साफ देखने को मिलता है। कभी इस मेले में वाद्य यंत्रों का अच्छा खासा कारोबार हुआ करता था, लेकिन अब इनकी बिक्री कम होने लगी है।
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इस बार भी वाद्ययंत्रों के व्यापारी निराश ही दिखाई दे रहे हैं। कड़ी मेहनत करके तैयार किए गए ढोल, नगाड़े, करनाल, रणसिघे समेत मूर्तियों की कोई टोह नहीं ले रहा है। दिन भर व्यापारी ग्राहकों का इंतजार करते ही दिखाई देते हैं और शाम को मायूसी के साथ अपना सामान समेटने को मजबूर हो जाते हैं।
वाद्ययंत्रों के व्यापारियों में नेक सिंह सोनी, थाची मंडी, मस्तराम, डोलाराम और रामदास ने बताया कि पिछले 32 सालों में लोग वाद्ययंत्रों को हाथों-हाथ लेते थे, लेकिन पिछले सात सालों से अब गिने-चुने लोग ही इनको खरीदते हैं।
उन्होंने आजकल शादियों और अन्य समारोह में करनाल, रणसिंघे ओर ढोल नगाडे़ के जगह डीजे और म्यूजिकल चल पड़ा है, जिसके कारण इस वाद्ययंत्रों को कारोबार सिमटता जा रहा है। उन्होंने कहा कि हिमाचल प्रदेश की पहचान इन वाद्ययंत्रों से पहचाना जाता है, लेकिन आधुनिकता का दौर होने से हम अपनी पहचान को खो रहे हैं।
वाद्ययंत्र---- रेट इस वर्ष----पिछले साल
ढोल----------16 हजार--------14 हजार
नरसिंघा------13 हजार----------11 हजार
करनाल------13 हजार-----------11 हजार
कसाल---5 से 15 हजार------5 से 15 हजार
नगाड़े-----800----------------700
घंटी------5000---------------5000