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यहां ताले में सहेजकर रखा जाता है पानी

Mon, 16 Jun 2014 07:52 PM IST
Updated Mon, 16 Jun 2014 07:52 PM IST
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Tradition in  hamirpur : water still preserved in the Locks

हिमाचल ही नहीं, पूरा देश गर्मियों में जल संकट से जूझता है। जल संरक्षण के लिए करोड़ों की योजनाएं बन रही हैं, लेकिन हमीरपुर जिले के बुजुर्गों ने वर्षों पहले ही जल संरक्षण का एक ऐसा अनोखा उपाय ईजाद किया, जिससे पहाड़ों से रिसते पानी को ‘खातरी’ में स्टोर उसे गर्मियों में उपयोग में लाया जा सके।

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पहाड़ को खोद बीच में बनाईं ये खातरियां आज भी मौजूद हैं। वर्षों पुराना जल संरक्षण का यह फार्मूला हमीरपुर, मंडी, कांगड़ा जैसे कई इलाकों में इन दिनों भी कारगर साबित हो रहा है।
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बरसात के दिनों में सहेजे पानी को खातरियों में गर्मियों तक ताले में रखा जाता है।

जलसंकट से निजात पाने की अनोखी मिसाल

Tradition in  hamirpur : water still preserved in the Locks

बुजुर्ग बताते हैं पहले हर परिवार की अलग-अलग खातरियां होती थीं। हमीरपुर में कई इलाके ऐसे हैं, जहां वर्षों से खातरियों में बरसात का पानी गर्मियों के लिए एकत्रित किया जाता है।

इन खातरियों का पानी स्वच्छ और सुरक्षित रहे इसके लिए खातरी के मुहाने पर गेट बनाकर ताला लगा दिया जाता है। पूर्व के समय जब फ्रिज नहीं थे तो मेहमान आने पर तुरंत खातरी से ठंडा पानी लाकर पिलाया जाता था।

भले ही सरकारी नल में पानी आए या न आए, खातरी में शुद्ध और ठंडा पानी आपको हर समय मिलेगा। जलसंकट से निजात पाने के लिए पूरे देश के लिए यह अनोखी मिसाल है।

अभी भी हजारों की तादाद में खातरियां

Tradition in  hamirpur : water still preserved in the Locks

हमीरपुर जिले में पहले हजारों की तादात में खातरियां थीं। पेयजल स्कीमें आने के बाद अब 1500 के करीब खातरियां चालू हालत में हैं। बमसन और सुजानपुर क्षेत्र की एक दर्जन से ज्यादा पंचायतों में खातरियां हैं।

समीरपुर, पंजोत, बराड़ा, पटनौण, टिक्कर बुहला, दरब्यार, नाड़सी, टपरे, बारीं मंदिर, चंबोह, बगवाड़ा, डुगली और सुजानपुर जैसे क्षेत्रों में एक हजार से अधिक खातरियां अच्छी हालत में हैं।

हमीरपुर से सटे मंडी जिले के संधोल, टीहरा, गद्दीधार, समौर, सकलाना, कमलाह पंचायतों में आज भी 250 से ज्यादा परिवार खातरियों का पानी पी रहे हैं।

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जिस घर की खातरी हो, वहीं रिश्ता

Tradition in  hamirpur : water still preserved in the Locks

समीरपुर पंचायत के 80 वर्षीय मरचू राम ने बताया कि टिक्करी, संगरोह, घराण, समीरपुर, अवाहदेवी जैसे क्षेत्रों में पीने के पानी के लिए 5-6 किमी तक जाना पड़ता था। पानी की किल्लत से निपटने के लिए अपनी-अपनी जमीनों पर खातरियों का निर्माण किया गया था। उस दौरान रिश्ता करते वक्त लड़की वाले यह जरूर पूछते थे कि आपकी खातरी है या नहीं।

क्या है खातरी

पहाड़ (सप्पड़) को खोदकर एक कमरे के आकार का गड्डा बनाया जाता है। इसमें बारिश का पानी रिस-रिस कर अपने आप एकत्रित होता रहता है। इसे गर्मियों में उपयोग में लाते हैं। यह पानी शीतल और शुद्ध माना जाता है। इसको विशेष कारीगर बनाते हैं।

समीरपुर के अमर चंद, शंकर दास, कमलेश कुमार, देशराज, रामराज ने बताया कि वे कभी खातरियां बनाकर अपनी रोजी-रोटी चलाते थे। समीरपुर पंचायत के पूर्व प्रधान राकेश ठाकुर कहते हैं कि बुजुर्गों ने जल संकट से निपटने को खातरियों का उपाय ढूंढा था, लेकिन अब न तो लोग और न ही प्रशासन इन्हें सहेजने में रुचि दिखा रहा है।

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