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यूरोप की पद्धति से अब यहां होगा गले के कैंसर का इलाज

Wed, 13 Apr 2016 10:18 AM IST
सतीश वालिया /अमर उजाला, धर्मशाला
सतीश वालिया /अमर उजाला, धर्मशाला Updated Wed, 13 Apr 2016 10:18 AM IST
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throat cancer treatment in tanda medical college kangra
पहले गले के कैंसर होने पर मुंह से लेकर गले तक का पूरा भाग निकाल लिया जाता था।

टांडा मेडिकल कॉलेज गले के कैंसर का सफल इलाज करने वाला प्रदेश का पहला मेडिकल कॉलेज होगा। कैंसर की होने वाली सर्जरी में गले से निकाले जाने वाला पूरा भाग दोबारा से इंप्लांट हो सकेगा। मरीज के लिए विशेष यह होगा कि गले के भाग को इंप्लांट करने के बाद वह पहले की तरह ही काम कर सकेगा। वह दूसरे व्यक्ति पर आत्मनिर्भर नहीं होगा। इससे पहले ऑपरेशन के बाद मरीज के गले का कैंसर वाला भाग निकाल लिया जाता था।

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इससे मरीज न तो सुन पाता था और न ही बोल पाता था। इतना ही नहीं, वह खाना भी नहीं खा पाता था। अब नई पद्धति से ऑपरेशन कर इंप्लांट करने पर मरीज अपने आप को असाधारण महसूस नहीं करेगा। पहले गले के कैंसर होने पर मुंह से लेकर गले तक का पूरा भाग निकाल लिया जाता था। मरीज सांस भी आराम से नहीं ले पाता था।

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यूरोप की पद्धति से गले के कैंसर का इलाज

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टांडा मेडिकल कॉलेज - फोटो : फाइल फोटो

सांस लेने के लिए मरीज के गले और छाती में छेद किया जाता था। इसके बाद ही ऑक्सीजन मरीज के शरीर तक पहुंचती थी। ऑपरेशन के बाद मरीज की सूंघने की शक्ति भी नहीं जाएगी। पहले मरीज की सूंघने की शक्ति तक चली जाती थी।

गले का इंप्लांट करने के बाद मरीज बोल और सुन भी पाएगा। टांडा मेडिकल कॉलेज में दो माह के बाद इस यूरोप की पद्धति पर गले के कैंसर पीड़ित लोगों के ऑपरेशन शुरू होंगे। मरीज को आपरेशन करवाने पर दो लाख रुपये खर्च करने होंगे।

टांडा मेडिकल कॉलेज के प्रवक्ता डा. मनीष सरोच ने बताया कि यूरोप की पद्धति से अब टांडा मेडिकल कॉलेज में भी गले का इंप्लांट हो सकेगा। इंप्लांट का मतलब यानी कैंसर के बाद गले का निकाला गया भाग दोबारा से डालना है।

इंप्लांट के बाद मरीज पहले की तरह ही बोल सुन और खाने का आनंद ले सकेंगे। ऑपरेशन के बाद मरीज अपना काम भी स्वयं ही करेगा। दूसरे व्यक्ति पर आत्मनिर्भर नहीं होगा।

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