{"_id":"39ebe29477c782f09976adf3707ccb07","slug":"threat-to-heritage-villages-in-himacal-hindi-news","type":"story","status":"publish","title_hn":"गांव गोद लेने की होड़, धूल चाट रहे धरोहर गांव","category":{"title":"City & states","title_hn":"शहर और राज्य","slug":"city-and-states"}}
गांव गोद लेने की होड़, धूल चाट रहे धरोहर गांव
सतीश डढवाल/अमर उजाला, देहरागोपीपुर (कांगड़ा)
Updated Wed, 03 Dec 2014 11:52 AM IST
विज्ञापन
खबरें लगातार पढ़ने के लिए अमर उजाला एप डाउनलोड करें
या
वेबसाइट पर पढ़ना जारी रखने के लिए वीडियो विज्ञापन देखें
अगर आपके पास प्रीमियम मेंबरशिप है तो
देश भर में सांसदों में गांव को गोद लेकर आदर्श बनाने की होड़ है। लेकिन धरोहर का दर्जा पाने वाले देहरा उपमंडल के परागपुर और गरली की तालाबंद हवेलियां आज भी बदहाल हैं। दोनों गांव योजनाबद्ध भवन निर्माण, प्राचीन कलाकृतियों और लकड़ी पर की गई नक्काशी से बनी भव्य हवेलियों के लिए जाने जाते थे।
विज्ञापन
1991 की पर्यटन नीति के तहत 1997 में दोनों गांवों को धरोहर का दर्जा मिला। मकसद था, प्राचीन धरोहरों को बचाना और पर्यटन से इन गांवों को जोड़ना। करीब डेढ़ सौ साल पुरानी ये हवेलियां आज भी हमारी संस्कृति और प्राचीन परंपरा को तरोताजा तो करती हैं, लेकिन अब बदहाल हैं।
विज्ञापन
1991 की इस पर्यटन नीति में प्रदेश की धरोहरों को मरम्मत के माध्यम से नया रूप देकर इन्हें संवारने का प्रावधान था। लेकिन परागपुर पहुंचने तक रास्ते में कोई भी ऐसा साइन बोर्ड नहीं दिखता, जिससे पता चल सके कि यह धरोहर गांव है। यहां पुरानी हवेलियां तो हैं, लेकिन कई हवेलियों के दरवाजों पर ताले लटके हैं। न स्ट्रीट लाइट है और न ही पर्यटकों के लिए सूचना पट्ट। म्यूजियम में अक्सर ताला लगा होता है।
विज्ञापन
स्थानीय हंसराज, अशोक पटियाल, प्रवेश कुमार कहते हैं कि गरली-परागपुर गांव नाम के ही धरोहर गांव हैं। विकास के लिए पैसा तो आया लेकिन खर्च कहां हुआ, दिखाई नहीं देता। हेरिटेज कमेटी के सदस्य एवं पंचायत प्रधान रूपेंद्र सिंह डैनी ने बताया कि सरकार ने खस्ताहाल और गिर रही हवेलियों के लिए कोई स्पष्ट नीति तैयार नहीं की है।
52 लाख मिले, खर्च हुए 15 लाख
1997 में प्रदेश सरकार ने गांव को संवारने के लिए 52 लाख मंजूर किए। इसमें से आज तक सिर्फ 15 लाख रुपये खर्च हो पाए। हालांकि ये 52 लाख रुपये यहां टूरिस्ट रिसेप्शन सेंटर, हर्बल पार्क एंड क्राफ्ट, साइनेजिज, टूरिस्ट लिटरेचर, गरली के तालाब की सफाई और विकास और पर्यटन सुविधाओं पर खर्च होने थे। लोगों ने आरटीआई के तहत भी ये जानकारी ली, लेकिन पूरा आंकड़ा स्पष्ट नहीं है।
9 दिसंबर 1997 को मिला धरोहर का दर्जा
परागपुर और गरली को प्रथम धरोहर गांव होने का गौरव 9 दिसंबर 1997 को मिला। लोगों के अनुसार हवेलियों के जर्जर होने का मुख्य कारण इन हवेलियों के मालिक हैं, जो हवेलियों पर ताला लगाकर देश या विदेश में बस गए हैं।
धरोहर गांव को संवारने के लिए विभाग प्रयासरत है। जिला कांगड़ा से निदेशक को सुझाव भी भेजे गए हैं। धरोहर गांव को संवारने की कवायद जल्द ही शुरू होने वाली है।
- प्रभात चौधरी, पर्यटन विभाग के उपनिदेशक