शहीदों की शहादत को भूली सरकार
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आज हम 15वां कारगिल शहादत दिवस मना रहा है। मगर दुख इस बात का है कि हिमाचल सरकार ने कारगिल युद्ध के बाद जो शहीदों को सम्मान देने का ऐलान किया था।
उसको वह अब भूल चुकी है। उनके नाम पर बने पार्कों का काम अधूरा पड़ा हैं तो वहीं उनके परिजन आज तक उनका हक दिलवाने की लड़ाई लड़ रहे हैं।
52 सपूत हुए थे शहीद
कारगिल युद्ध में प्रदेश के 52 सपूतों ने अपनी जान की कुर्बानी दी थी। मंडी जिले के 10 जवानों ने कारगिल में शहादत का जाम पीया। मंडी शहर में कारगिल पार्क बनाने की घोषणा सरकार ने की थी, यहां मात्र शहीदों के नाम की पट्टिकाएं हैं।
इसे भी लोनिवि के स्टोर की दीवार पर चिपका रखा है। शहीद हवलदार किशन चंद के नाम पर स्टेडियम की घोषणा हुई पर प्रतिमा की स्थापना नहीं हो पाई।
सुंदरनगर में शहीद चौक पर महज साइन बोर्ड ही टंगा है। शहीद कैप्टन दीपक गुलेरिया की याद में स्मारक और शहीद कैप्टन दीपक गुलेरिया की स्कूल में प्रतिमा नहीं लग पाई। शहीद पूर्ण चंद के घर तक पहुंचने वाली सड़क अधूरी है।
स्मारक भी नहीं बना पाई सरकार
कारगिल युद्ध में बिलासपुर के सात जवानों ने शहादत का जाम पीया है। इसमें से सेना मेडल विजेता मस्त राम, अश्वनी कुमार और उधम सिंह के नाम पर सड़क बनने की घोषणाएं पूरी नहीं हो पाई।
शहीद अश्वनी के नाम से सड़क तो बनी पर मरम्मत को कुछ नहीं हुआ। सोलन के सूबेदार शहीद तारा चंद के नाम पर एक भी घोषणा पूरी नहीं हुई है।
विक्रम बतरा के पिता हैं नाराज
कारगिल युद्ध के हीरो परमवीर चक्र विजेता शहीद कैप्टन विक्रम बतरा की पालमपुर में लगी प्रतिमा को लेकर उनके पिता जीएल बतरा ने नाराजगी जताई थी।
कहा था कि उनके बेटे की जो प्रतिमा पालमपुर में लगी है, उसका जरा भी रंग रूप उनके जांबाज बेटे से नहीं मिलता है। इसे बदला जाए, लेकिन यह प्रतिमा आज तक नहीं बदली गई है। वहीं, मेजर सुधीर वालिया के गांव बनूरी का नाम शहीद मेजर सुधीर वालिया के नाम पर नहीं रखा गया।
शहीद राइफल मैन प्रदीप के नाम पर आज तक सड़क नहीं बना पाई। शहीद धर्मेंद्र सिंह की माता शीला देवी सरकार से मिलने वाली सुविधाओं से नाराज हैं।