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चिट्टे का काला सच: मजे से शुरू, बर्बादी पर खत्म; नशे की गिरफ्त में आए युवक ने किए कई खुलासे

Sat, 14 Feb 2026 05:00 AM IST
Krishan Singh नीरज महाजन, संवाद न्यूज एजेंसी, भराड़ी (बिलासपुर)।
नीरज महाजन, संवाद न्यूज एजेंसी, भराड़ी (बिलासपुर)। Published by: Krishan Singh Updated Sat, 14 Feb 2026 05:00 AM IST
सार

 नशे के दलदल में फंसे एक 32 वर्षीय युवक की दर्दनाक दास्तां झकझोर देती है, जहां मजे के नाम पर शुरू हुआ नशे का सफर अपराध, जेल और तबाही पर खत्म हो रहा है।

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The dark truth of Chitta: Starts with fun, ends with destruction, a young man caught in the grip of addiction
चिट्टा(फाइल) - फोटो : संवाद

विस्तार

चिट्टे (हेरोइन) की लत ने न जाने कितने घरों के चिराग बुझा दिए हैं। नशे के दलदल में फंसे एक 32 वर्षीय युवक की दर्दनाक दास्तां झकझोर देती है, जहां मजे के नाम पर शुरू हुआ नशे का सफर अपराध, जेल और तबाही पर खत्म हो रहा है। युवक का कहना है कि उसने 20 साल की उम्र में एक भूल की थी, उसकी सजा वह आज तक भुगत रहा है। पीड़ित युवक ने बताया कि वह महज 20 साल का था, जब चंडीगढ़ से आए दोस्त ने उसे पहली बार चिट्टा चखाया। दोस्त ने फुसलाते हुए कहा इसे लेने बहुत अच्छा लगता है, सारी टेंशन दूर हो जाती है। शुरुआत में युवक ने इसे महज मनोरंजन समझा। दोस्त ने तीन-चार बार उसे मुफ्त में चिट्टा दिया। यही वह ट्रैप था, जिसमें वह फंस गया। जैसे ही शरीर को इसकी लत लगी, दोस्त ने असली रंग दिखाया और कहा कि अब फ्री में नहीं मिलेगा, पैसे लाने होंगे। नशे की तलब जब हावी हुई, तो युवक ने घर वालों को ठगना शुरू कर दिया। कभी कॉलेज की फीस, नई किताब, कभी बीमारी का नाटक कर उसने मां-बाप की गाढ़ी कमाई नशे में फूंक दी। जब घर से पैसे मिलना बंद हुए, तो रिश्तेदारों और परिचितों से उधारी शुरू कर दी। युवक के अनुसार चिट्टे की ललक ऐसी होती है कि इंसान अपनी इज्जत भूल जाता है। बस किसी भी तरह सुई (डोज) चाहिए होती है। 

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नसें सूखीं तो गुप्तांगों में लगाने लगे इंजेक्शन
युवक ने नशे के उस घिनौने सच का खुलासा किया, जिसे सुनकर रूह कांप जाए। उसने बताया कि लगातार इंजेक्शन लगाने से जब हाथ-पैर की नसें ब्लॉक हो जाती हैं, तो नशेड़ी गुप्तांगों (संवेदनशील अंगों) की नसों में इंजेक्शन लगाने लगते हैं। इतना ही नहीं, चिट्टा न मिलने पर नशीली गोलियों को पानी में उबालकर सीधे नसों में उतारा जाता है, जो किसी भी पल हार्ट फेल का कारण बन सकता है।
 

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नशेड़ी से तस्कर बनने का सफर और सलाखें
जब उधारी का बोझ बढ़ा, तो युवक का संपर्क बाहरी राज्यों के नशा तस्करों से हो गया। तस्करों ने उसे उधारी में चिट्टा देना शुरू किया और बदले में उसे खुद तस्करी करने के लिए प्रेरित किया। नशे की पूर्ति के लिए वह खुद तस्कर बन गया। इस काले रास्ते पर चलते हुए वह तीन बार पुलिस के हत्थे चढ़ा, केस दर्ज हुए और जेल भी काटी। लेकिन युवक का कहना है कि नशा मुक्ति का सही रास्ता न मिलने के कारण वह जेल से बाहर आते ही फिर उसी दलदल में गिर जाता था।

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चिंताजनक: स्कूली छात्र और लड़कियां भी निशाने पर
युवक ने खुलासा किया कि अब माफिया का नेटवर्क इतना फैल चुका है कि 16 से 18 साल के कई किशोर और कई कम उम्र की लड़कियां भी इसकी गिरफ्त में हैं। स्कूल-कॉलेज के आसपास नशा माफिया सक्रिय है, जो पहले बच्चों को मुफ्त में लत लगाते हैं और फिर उन्हें अपना सप्लायर बना लेते हैं।

मैं तो बर्बाद हुआ, नहीं चाहता कोई और इस नर्क में गिरे
महज 32 साल की उम्र में यह युवक अपनी जिंदगी से हार चुका है। दिहाड़ी-मजदूरी करता है। शरीर में बीमारियां घर कर चुकी हैं, काम करने की शक्ति खत्म हो गई है और मानसिक तनाव हर वक्त बना रहता है। मायूस स्वर में उसने कहा कि मैं तो बर्बाद हो गया, लेकिन चाहता हूं कि देवभूमि का कोई और बेटा इस नर्क में न गिरे।
 

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