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Shimla News: तहसील कल्याण अधिकारी 13 वर्ष बाद दोषमुक्त करार
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भ्रष्टाचार और दुष्कर्म के लगे थे आरोप
अगस्त 2012 में उपमंडल ठियोग में दर्ज हुआ था मामला
संवाद न्यूज एजेंसी
शिमला। अदालत ने भ्रष्टाचार और दुष्कर्म के एक मामले में एक तत्कालीन तहसील कल्याण अधिकारी के खिलाफ दोष सिद्ध नहीं होने पर उन्हें बरी कर दिया है। विशेष न्यायाधीश (वन) अजय मेहता की अदालत ने यह फैसला सुनाया।
अदालत के मुताबिक अभियोजन पक्ष अभियुक्त के खिलाफ आरोपों को सभी उचित संदेह से परे साबित करने में विफल रहा है। जिला बिलासपुर के थाना सदर निवासी रामानंद पर एक महिला ने गृह अनुदान योजना के तहत मकान ऋण स्वीकृत करवाने बदले में यौन संतुष्टि की मांग और इस काम के लिए एक घी का डिब्बा मांगने के आरोप लगाए थे। यह मामला वर्ष 2012 में हिमाचल प्रदेश राज्य सतर्कता एवं भ्रष्टाचार निरोधक ब्यूरो (एसवी एवं एसीबी) शिमला का है। जांच एजेंसी ने तत्कालीन कल्याण अधिकारी के क्वार्टर में छापा मारकर पीड़ित सहित अधिकारी को संदिग्ध हालत में पकड़ने का दावा किया था। इसके बाद अधिकारी को गिरफ्तार कर भ्रष्टाचार निवारण अधिनियम की धारा 7, 13(1) (डी) सहपठित धारा 13 (2) और आईपीसी की धारा 376 के साथ एफआईआर दर्ज की मामले की जांच की। अभियोजन पक्ष की ओर से मामले को साबित करने के लिए 32 गवाहों की जांच की लेकिन अदालत ने ठोस सबूतों के अभाव से अभियुक्त रामानंद को दंडनीय अपराधों के लिए दोषमुक्त किया है। संवाद
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अगस्त 2012 में उपमंडल ठियोग में दर्ज हुआ था मामला
संवाद न्यूज एजेंसी
शिमला। अदालत ने भ्रष्टाचार और दुष्कर्म के एक मामले में एक तत्कालीन तहसील कल्याण अधिकारी के खिलाफ दोष सिद्ध नहीं होने पर उन्हें बरी कर दिया है। विशेष न्यायाधीश (वन) अजय मेहता की अदालत ने यह फैसला सुनाया।
अदालत के मुताबिक अभियोजन पक्ष अभियुक्त के खिलाफ आरोपों को सभी उचित संदेह से परे साबित करने में विफल रहा है। जिला बिलासपुर के थाना सदर निवासी रामानंद पर एक महिला ने गृह अनुदान योजना के तहत मकान ऋण स्वीकृत करवाने बदले में यौन संतुष्टि की मांग और इस काम के लिए एक घी का डिब्बा मांगने के आरोप लगाए थे। यह मामला वर्ष 2012 में हिमाचल प्रदेश राज्य सतर्कता एवं भ्रष्टाचार निरोधक ब्यूरो (एसवी एवं एसीबी) शिमला का है। जांच एजेंसी ने तत्कालीन कल्याण अधिकारी के क्वार्टर में छापा मारकर पीड़ित सहित अधिकारी को संदिग्ध हालत में पकड़ने का दावा किया था। इसके बाद अधिकारी को गिरफ्तार कर भ्रष्टाचार निवारण अधिनियम की धारा 7, 13(1) (डी) सहपठित धारा 13 (2) और आईपीसी की धारा 376 के साथ एफआईआर दर्ज की मामले की जांच की। अभियोजन पक्ष की ओर से मामले को साबित करने के लिए 32 गवाहों की जांच की लेकिन अदालत ने ठोस सबूतों के अभाव से अभियुक्त रामानंद को दंडनीय अपराधों के लिए दोषमुक्त किया है। संवाद
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