शिक्षक सियासत में चूर, बच्चे पढ़ाई से दूर
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सियासत की भट्टी में हिमाचल के नौनिहालों की पढ़ाई भेंट चढ़ रही है। शिक्षक राजनीति में चूर हो रहे हैं तो बच्चे पढ़ाई से दूर। एक अनुमान के मुताबिक सूबे में 75 में से 60 हजार शिक्षक किसी न किसी संगठन से जुड़कर राजनीति में मशगूल हैं। वर्तमान में शिक्षकों के करीब 34 संगठन हैं, जिनमें से महज 14 संघ विभाग के पास पंजीकृत हैं।
20 संगठन न तो विभाग के पास पंजीकृत हैं और न ही सोसायटी एक्ट के तहत पंजीकृत हैं। शिक्षा के स्तर को सुधारने के बड़े-बड़े दावे तो होते हैं पर इस पर कोई भी सरकार लगाम नहीं लगा पाई। बड़ी बात तो यह है कि शिक्षकों को राजनीति करने के लिए विभाग बाकायदा स्पेशल छुट्टी भी देता है।
राजनीति में मशगूल शिक्षक
राज्य स्तर के पदाधिकारियों और जिला अध्यक्षों को 20 दिन, जिला के पदाधिकारियों को 10 दिन और ब्लॉक स्तर के पदाधिकारियों को 5 दिन की स्पेशल छुट्टी मिलती है। प्रारंभिक शिक्षा विभाग में अपेक्षाकृत अधिक संगठन कार्य कर रहे हैं। एक संगठन में करीब 1000 से 2500 और 3000 शिक्षक ब्लॉक स्तर से लेकर राज्य स्तर तक पदाधिकारी और सदस्यता हासिल किए हुए हैं। इस तरह 60 हजार से अधिक शिक्षक किसी न किसी संगठन से जुड़े हैं।
इनमें प्राइमरी से लेकर प्रिंसिपल स्तर के शिक्षक शामिल हैं। उल्लेखनीय है कि लोकसभा और विधानसभा के चुनाव होते हैं तो हर पार्टी के एजेंडे में शिक्षकों से जुड़े मसले प्रमुखता से उठते हैं। इन मसलों को पूरा करने के लिए राजनीतिक पार्टियां भी तत्परता दिखाती हैं। चुनावी वादों का परिणाम चाहे जो हो पर शिक्षकों का वोट बैंक हर पार्टी को लुभाता है।
टीचर कम्यूनिटी के लिए ठीक नहीं
हिमाचल प्रदेश अध्यापक संघ के अध्यक्ष एसएस मांटा ने कहा कि बच्चों की पढ़ाई प्रभावित हो रही है। इतने सारे संगठन शिक्षक कम्यूनिटी के लिए सही नहीं है। एक संगठन होता है तो इससे शिक्षकों के हितों की लड़ाई को प्रभावशाली तरीकों से लड़ा जा सकता है। सरकार को चाहिए कि वे सभी एसोसिएशन का एक संगठन बनाए और उसे ही मान्यता दें।
होना चाहिए एक संगठन- हिमाचल राजकीय अध्यापक संघ के अध्यक्ष विरेंद्र चौहान ने कहा कि इतने सारे संगठन शिक्षा, शिक्षक और समाज के हित में नहीं हैं। यूनियनों की एक्टिविटीज में बच्चों की पढ़ाई सबसे अधिक प्रभावित हो रही है। एक टीचर 4 से 5 संगठनों के साथ जुड़ा हुआ है। यदि शिक्षा का स्तर बढ़ाना है तो सरकार को विभाग में पनप रहे नए- नए संगठनों पर लगाम लगानी होगी।
सभी कक्षाओं में लगे हों कैमरे
सभी कक्षाओं में लगे हों कैमरे। सचिवालय स्तर पर होनी चाहिए मानीटरिंग। लगे ड्रेस कोड ताकि स्कूल टाइम पर शिक्षक स्कूल से बाहर न जा सकें। शिक्षकों के बच्चे भी सरकारी स्कूलों में करें पढ़ाई, जारी करें अधिसूचना। प्री प्राइमरी क्लासिस शुरू हों ताकि बच्चों का बेस बने। सिलेबस बदलने से कुछ नहीं होगा, शिक्षकों को समर्पण से पढ़ाना होगा। शिक्षा का स्तर गिरने के लिए 80 फीसदी तक शिक्षक जिम्मेदार।
इन्होंने भेजे सुझाव- अमर उजाला को चंबा से नवीन कुमार, हमीरपुर से राजेश सिंह, कुल्लू से श्याम चंद, मंडी से मनोहर सिंह, धर्मशाला से पंकज कुमार, शिमला से रमेश सिंह और घनश्याम चौहान, सोलन से मीनाक्षी और रामकुमार ने सुझाव भेजे हैं। शिक्षा के सच में उठाए जा रहे मामलों पर कोई भी जागरूक पाठक अपनी राय 97360-10280 नंबर पर सुबह 11 बजे से शाम 5 बजे तक दे सकते हैं।
ये हैं शिक्षकों के मुख्य संघ
राजकीय अध्यापक संघ, शिक्षक महासंघ, स्कूल प्रवक्ता संघ, मुख्य अध्यापक संवर्ग अधिकारी, अनुबंध शिक्षक संघ, जेबीटी प्रशिक्षु संघ, टीजीटी अध्यापक संघ, पीरियड आधारित अध्यापक संघ, विशेष प्रमाण प्राप्त प्राप्त बुनियादी शिक्षक, कंप्यूटर टीचर।
प्रवक्ता संघ, पैट, पैरा, पीटीए, एसएमसी, प्राथमिक शिक्षक संघ, शिक्षक क्रांति मंच, स्कूल प्रधानाचार्य एवं निरीक्षण अधिकारी संघ। 10 साल से विभाग ने इन संगठनों का रिव्यू तक नहीं किया जबकि हर साल रिव्यू करना जरूरी है।