पर्यावरण और परंपराओं की इस बलि पर कौन सी अदालत रोक लगाएगी
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यह कोई बहुत पुरानी कहानी नहीं है। कोई चार पांच साल पहले तक सतलुज के किनारे गर्म पानी के चश्मों के इर्द-गिर्द हर मकर संक्रांति पर एक बहुत बड़ा मेला जुटता था। सर्द हवाओं और हरी भरी वादियों के बीच यहां एक महाकुंभ आकार लेता था। तुलादान के लिए मशहूर इस तीर्थ स्थल की तुलना हरिद्वार से की जाती थी। देश भर से लाखों श्रद्धालु यहां स्नान के लिए जुटते थे।
अपर हिमाचल की कई सड़कों पर घंटों जाम लगा रहता था। हिमाचल के कई क्षेत्रों के लोग यहां अस्थियां विसर्जित कर अपने प्रियजनों के मोक्ष की प्रार्थना करते थे। लेकिन पर्यावरण और परंपरा की कीमत पर बने 800 मेगावाट के कोल डैम प्रोजेक्ट ने अब सब कुछ तबाह कर दिया। डैम के कारण जल भराव के चलते अब सतलुज नदी पर लगभग 25 किमी लंबी झील बन गई है।
इससे यहां आसपास के कई इलाके जलमग्न हो गए हैं। अब वहां गर्म पानी के चश्मे नहीं फूटते। डैम में जल भराव के कारण बन रही कृत्रिम झील को देखते हुए अलर्ट जारी किया गया है कि नदी के किनारों पर बसे गांव वाले नदी के पास न जाएं। उस नदी के पास जिसका मीठा पानी इनकी रगों में खून बनकर दौड़ रहा है। इनके लिए इस बार संक्रांति कितनी उदास और सहमी हुई है।
यहां जानिए क्या है संक्रांति
संक्रांति का अर्थ है- सूर्य का एक राशि से दूसरी राशि में जाना। सूर्य का दूसरी राशि में प्रवेश होने का वक्त इतना लघु होता है कि उसे पकड़ पाना लगभग नामुकिन है। देवी पुराण के मुताबिक जब एक स्वस्थ और सुखी मनुष्य एक बार पलक झपकता है तो उसका तीसवां काल तत्पर कहलाता है। तत्पर का सौवां भाग त्रुटि कहलाता है। त्रुटि के सौंवे भाग में सूर्य दूसरी राशि में प्रवेश करता है।
यह प्राकृतिक घटना बेहद खामोशी से होती है। इसीलिए इसका महत्व है। मकर संक्रांति से सूर्य की उत्तरायण गति आरंभ होती है और पवित्र दिन शुरू हो जाते हैं। मान्यता है कि इस दिन किसी पवित्र नदी में स्नान और दान से मनुष्य सभी पापों से मुक्त हो जाता है। इस अवसर पर उसका दान अक्षय रहता है। दक्षिण में इसी दिन पोंगल नाम का उत्सव होता है।
यह तमिल वर्ष का पहला दिन है। पोंगल का अर्थ है उबलता हुआ पानी। हिमाचल के मणिकर्ण और करसोग के तत्तापानी के गर्म उबलते हुए चश्मों में क्या कोई समानता है? अगर है तो वाकई कोई बड़ी हैरत की बात नहीं है क्योंकि हमारी संस्कृति की जड़ें बहुत गहरे में हमारे समूचे राष्ट्र को एक-दूसरे से जोड़ती हैं।
जानिए तत्तापनी से जुड़ी खास कथा
पौराणिक दंत कथा है। भज्जी क्षेत्र के राजा सहस्रबाहू ने भगवान परशुराम के पिता जमदग्नि ऋषि पर आक्रमण किया। उस समय परशुराम मणिकर्ण में गर्म पानी के चश्मे में स्नान कर रहे थे। जैसे उन्हें हमले की सूचना मिली तो वह सीधे तत्तापानी के लिए रवाना हुए। कहते हैं कि तत्तापानी पहुंचकर ही उन्होंने धोती निचोड़ी थी। धोती को निचोड़ने पर जहां-जहां छींटे पड़े, वहां गर्म पानी के चश्मे फूट पड़े।
आप नास्तिक हैं तो इस कथा पर बिलकुल यकीन मत कीजिए। लेकिन अब वैज्ञानिक भी मानने लगे हैं कि तत्तापानी में गंधक युक्त गर्म पानी के इन चश्मों में स्नान करने से कई तरह के चर्म रोग और जोड़ों के दर्द ठीक हो जाते हैं। गहरी लोक आस्थाएं ऐसे ही धीरे-धीरे परंपराएं बन जाती हैं। और हम विकास के नाम पर इन परंपराओं की बलि चढ़ा रहे हैं। तरक्की और समृद्धि का हवाला देकर बेहद खतरनाक ढंग से पर्यावरण की हत्या करने की साजिश रच रहे हैं।
वह कहते हैं कि इस कोलडैम प्रोजेक्ट से हमें बिजली मिलेगी। कोलडैम बनाते वक्त तत्कालीन सरकार और महारथी इंजीनियरों ने ये क्यों नहीं सोचा कि यहां नदी झील बन जाएगी और हमारी सदियों पुरानी धरोहर नष्ट हो जाएगी। आस्था और परंपरा का सर्वनाश होगा। प्रकृति के साथ हम ये कैसा मजाक कर रहे हैं? विकास के नाम पर आखिर हमें कितनी बिजली चाहिए? सिर्फ हिमाचल में ही सैकड़ों बिजली परियोजनाएं चल रही हैं।
संकट में है पर्यावरण के प्राण
इसी नामुराद बिजली के लिए हमने सूबे में पर्यावरण के प्राणों को संकट में डाल दिया है। पहाड़ों का दिल चीरकर हम उसमें टनल बना रहे हैं। पहाड़ धंस रहे हैं। देखिए मकर संक्रांति के संग सूर्य की उत्तरायण गति शुरू हो गई और इस बार हिमाचल में जाड़ा नहीं आया। स्नो फाल का सीजन दो महीने आगे खिसक गया। एक मित्र ने बताया कि दिल्ली में अभी भी एसी चल रहे हैं।
रावी हो, ब्यास या सतलुज हिमाचल की इन सभी नदियों को देखिए। बांधों ने इनका दम घोंट दिया है। हिमाचल की नदियों का खनकता और कलकल करता मोहक संगीत शोक की मनहूस शहनाई में तब्दील हो गया है। ये कैसा विनाशकारी विकास है? आज मकर संक्रांति है और तत्तापानी का ये पूरा इलाका शोक में डूबा है। इलाके के लोग फोन पर अपनी तकलीफ साझा करते हैं।
विलुप्त होते गर्म चश्मों पर दुख की कविताएं लिखते हैं। लेकिन वे जल, जंगल और जमीन से जुड़े परंपरागत अधिकारों को पुन: स्थापित करने के लिए संघर्ष नहीं करते। पर्यावरण के लिहाज से हिमाचल तबाह हो रहा है लेकिन यहां टिहरी बांध विरोधी आंदोलन, नर्मदा बचाओ जैसा कोई बड़ा जन आंदोलन नहीं चल पाया।
इस विनाशकारी विकास के खिलाफ कई साल पहले चंबा, किन्नौर, कुल्लू में स्थानीय स्तर पर विरोध जरूर हुआ। गोलियां भी चलीं लेकिन फिर इन आंदोलनों ने दम तोड़ दिया। सुंदरलाल बहुगुणा, मेधा पाटेकर, अनिल पटेल, अरुणधती रॉय, बाबा आम्टे जैसे आंदोलनकारी यहां नहीं पैदा हुए। आखिर क्यों? आज मकर संक्रांति के स्नान के बाद इस पर सोचिएगा जरूर।