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टीबी का कहरः मरीजों का इलाज कर रहे सात डॉक्टर भी चपेट में, अब तक 542 मामले आए सामने
Mon, 14 Oct 2019 01:33 PM IST
अरविन्द ठाकुर
शशिभूषण पुरोहित, अमर उजाला, ऊना
शशिभूषण पुरोहित, अमर उजाला, ऊना
Published by: अरविन्द ठाकुर
Updated Mon, 14 Oct 2019 01:33 PM IST
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क्षय रोगियों का इलाज और उनकी पहचान करते हुए जिले के सात डॉक्टर भी टीबी की चपेट में आ गए हैं। यह खुलासा टीबी मुक्त हिमाचल अभियान की जिला स्तरीय क्षय रोग निवारण समिति की बैठक में हुआ है। सभी डॉक्टर एमडीआर यानी मल्टी ड्रग रेजिस्टेंट टीबी (बिगड़ी हुई टीबी) की चपेट में हैं। इन्हें छह महीने तक ऑब्जर्वेशन में रखकर इलाज किया जा रहा है।
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जिला क्षय रोग अधिकारी डॉ. अजय अत्री ने इसकी पुष्टि की है। उन्होंने बताया कि संक्रमित सभी डॉक्टरों का उपचार शुरू कर दिया गया है। सूत्र बताते हैं कि क्षय रोग का संक्रमण अधिकतर प्रवासी मजदूरों में है। प्रवासी जब फसलों की कटाई के सीजन में राज्य से बाहर जाते हैं तो इस दौरान संक्रमण की चपेट में आ जाते हैं। जिला ऊना में इस वर्ष अब तक 542 टीबी रोगियों की पहचान हुई है। वर्तमान में 22 रोगियों का उपचार चल रहा है।
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उद्योगों में की जाएगी मरीजों की पहचान
स्वास्थ्य विभाग उद्योगों में टीबी के रोगियों की पहचान कर उन्हें उपचार देने का अभियान शुरू करेेगा। महकमे ने अलर्ट किया है कि टीबी की पहचान हो जाने पर पहली दवाई लेने के बाद कम से कम 15 दिन तक किसी के संपर्क में न आएं। आधुनिक चिकित्सा पद्धति में टीबी का संपूर्ण इलाज संभव है लेकिन इसके लिए 4 से 6 माह तक का समय लग जाता है।
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लक्षण और बचाव
दो सप्ताह से अधिक समय तक खांसी, शाम के समय बुखार, पसीना आना और वजन कम होना टीबी के लक्षण हैं
लक्षण दिखाई देने पर चिकित्सा केंद्र में बलगम की जांच करवानी चाहिए, सरकार टीबी के हर रोगी के इलाज पर 20 से 25 लाख रुपये खर्च करती है
रोगियों को प्रतिमाह 500 रुपये भी दिए जाते हैं। संक्रमण की पुष्टि होने पर मरीज को अस्पताल तक पहुंचाने वाले को भी 500 रुपये दिए जाते हैं।