EXCLUSIVE: दलाईलामा ने बताई दिल की ख्वाहिश
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तकरीबन 56 साल से भारत में बतौर मेहमान रह रहे बौद्ध धर्मगुरु दलाईलामा अब खुद को भारत का पुत्र मानने लगे हैं। उनका कहना है कि निर्वासित जीवन के दौरान अगर अपने कार्यों को पूरा नहीं कर पाए तो वे भारत में पुनर्जन्म लेना चाहेंगे। नालंदा के विद्वानों को अपना आदर्श मानने वाले आध्यात्मिक गुरु दलाईलामा कहते हैं कि शारीरिक और मानसिक रूप से वे पूरी तरह भारतीय हैं।
भारत के अहिंसा, धार्मिक सद्भाव और धर्मनिरपेक्षता के संदेश को वह विश्व भर में प्रचारित कर रहे हैं। महात्मा गांधी के संदेश को दुनिया में फैला रहे हैं। दलाईलामा ने चिंता व्यक्त की कि उनके परिनिर्वाण के बाद चीन सरकार किसी कठपुतली दलाईलामा की घोषणा कर सकती है। जैसे चीन ने पंचेन लामा का ऐलान कर दिया। तिब्बती धर्मगुरू दलाईलामा ने कहा वे तिब्बत की स्वतंत्रता की मांग नहीं कर रहे हैं।
वे तिब्बत को यूरोपियन यूनियन की तरह रखना चाहते हैं। वर्तमान में तिब्बत की पूरी स्वतंत्रता संभव नहीं है। यूरोपियन यूनियन की तरह तिब्बत चीन के साथ रह सकता है। चीन के कई लोग उनकी मध्य मार्ग की नीति का समर्थन करते हैं लेकिन कुछ तिब्बती नौजवान उनकी नीति से सहमत नहीं हैं।
बीफ पर दिया बयान, कहा गाय का करो सम्मान
धर्मशाला के मैक्लोडगंज मठ में ‘अमर उजाला’ से विशेष बातचीत में नोबेल शांति पुरस्कार विजेता ने कहा कि धर्म एक निहायत व्यक्तिगत मसला है। शाकाहार सबसे उत्तम भोजन है लेकिन इसे किसी पर थोपा नहीं जा सकता। बीफ या मांसाहार का सेवन भौगोलिक, आर्थिक और सांस्कृतिक संरचना पर निर्भर करता है। उन्होंने कहा कि पहले वे भी मांसाहारी थे लेकिन अब उन्हें शाकाहार भोजन प्रिय लगता हैं।
उन्होंने कहा कि गाय का सभी को सम्मान करना चाहिए। धर्म को अलग रखकर ही राजनीति करनी चाहिए। भारत की महानता यह है कि यहां सभी धर्मों का सम्मान होता है। भारत के महान नेताओं ने सभी धर्मों को समान तवज्जो दी है। दुनिया को भारत के इस धर्मनिरपेक्ष मॉडल को अपनाने की जरूरत है। भारत ही विश्व को प्रेम, अहिंसा, त्याग और शांति का पाठ पढ़ा सकता है।
महात्मा गांधी ने किया सबसे बेहतर काम
अमर उजाला ने दलाईलामा से उनके कई विवादित बयानों पर भी खुलकर बात की। दलाईलामा ने बीबीसी को दिए एक इंटरव्यू में कहा था कि कोई महिला भी दलाईलामा हो सकती है लेकिन वह खूबसूरत और आकर्षक होनी चाहिए। इस पर कई महिला संगठनों ने आपत्ति की थी। दलाईलामा ने कहा उनके बयान को गलत अर्थों में लिया गया। उनका भाव यह नहीं था।
आध्यात्मिक गुरु के चेहरे पर एक दिव्यता होनी ही चाहिए। दलाईलामा का कहना है कि 1989 में जब उन्हें नोबेल शांति पुरस्कार मिला था, तब भी उन्होंने कहा था महात्मा गांधी नोबेल पुरस्कार के सबसे योग्य और उपयुक्त दावेदार थे। महात्मा गांधी ने अहिंसा और शांति के लिए बेहतरीन काम किया है। अगर वे जीवित होते तो अब भी शांति के लिए काम कर रहे होते।
पढ़िए इन सवालों पर क्या बोले दलाईलामा
सवाल: इन दिनों इराक, सीरिया, लीबिया, फिलीस्तीन और मिस्र में अशांति है। विश्व पर छाए इस संकट भरे माहौल को आप किस तरह से देखते हैं?
दलाईलामा : विश्व की सभी प्रमुख धार्मिक परंपराओं का मुख्य संदेश मानवीय मूल्यों को बढ़ाना है। विश्व के धर्मों में असमानताएं इसलिए हैं, क्योंकि इनके हिसाब से सृष्टि के रचयिता अलग-अलग हैं। धर्म के नाम पर विवाद समझ से परे है। जैन और बौद्ध धर्म में कोई रचयिता नहीं है। यह नास्तिक धर्म हैं (हंसते हुए)। लेकिन, समुदायों में धर्म के नाम पर विवाद दुखदायी है। राजनीतिक शक्ति और आर्थिक हितों की प्राप्ति के लिए धर्म का प्रयोग आज से नहीं, बल्कि कई वर्षों से होता आ रहा है। धर्म के नाम पर एक-दूसरे को जान से मारने का कोई आधार नहीं है। कुछ समय पहले बर्मा में बौद्ध और मुस्लिमों में तनाव बहुत दुखद था।
सवाल : लेकिन, अमेरिका की मशहूर टाइम मैगजीन ने बुद्धिस्ट आतंकवाद का नया मुहावरा गढ़ा?
दलाईलामा: यह दुखदायी है। श्रीलंका में बौद्धों और हिंदुओं में तनाव मन को पीड़ा वाला था। इस युग में लोगों को सभी धर्मों को सम्मान देना होगा। विश्व में भी शिया और सुन्नी तथा ईसाइयों में रोमन कैथोलिक और प्रोटेस्टैंट के संघर्ष में केवल आर्थिक हित ही उभरते हैं। आर्थिक संसाधनों पर कब्जे के लिए ही धर्म के नाम पर धार्मिक ठेकेदार हिंसा को बढ़ावा देने लगे हैं। राजनेताओं और सरकारों को जन आधार पर राजनीतिक मामले निपटाने के लिए धर्म को बीच में नहीं लाना चाहिए।
सवाल: भारत में इन दिनों बीफ को लेकर हो-हल्ला मचा है। इस मसले पर आप क्या राय रखते हैं?
दलाईलामा : धर्म एक व्यक्तिगत मामला है। शाकाहार सबसे उत्तम भोजन है। बीफ अथवा मांसाहार व्यक्ति की भौगोलिक, आर्थिक और सांस्कृतिक संरचना पर भी निर्भर करता है। हिंदू गाय का सम्मान करते हैं। ऐसे में इस तरह की बातों का सम्मान किया जाना चाहिए। कोई परंपरा किसी समाज या एक-दूसरे पर थोपी नहीं जा सकती। जब मैं भारत आया तो उस दौरान वर्ष 1960 में देश में कुछेक ही चिकन की दुकानें थीं, लेकिन अब विकास के नाम पर जगह जगह चिकन शॉप्स खुल गई हैं। दुकानों में मुर्गे-मुर्गिंया पिंजरे में कैद डर के मारे सिकुड़े रहते हैं (पिंजरे में कैद मुर्गे की भाव भंगिमा बनाते हुए)।
हां पहले मैं भी मांसाहारी था
सवाल: लेकिन, तिब्बत के कई लामा मांसाहारी भी हैं। एक वक्त था आप भी मांसाहारी हुआ करते थे?
दलाईलामा: हां पहले मैं भी मांसाहारी था, लेकिन 1965 में मैंने 20 माह के लिए मांसाहार त्याग दिया था। इसके बाद मुझे पीलिया हो गया। मैं बुद्ध की तरह पीला हो गया, आध्यात्म के अभ्यास से नहीं, बल्कि बीमारी से (ठहाका लगाते हुए)। फिर आयुर्वेदिक डॉक्टरों की सलाह पर मुझे मीट खाना पड़ा। हालांकि, अब मैं लगभग शाकाहारी हूं।
सवाल : अब आप कहां पुनर्जन्म लेना चाहेंगे? तिब्बत में या कहीं और?
दलाईलामा : अगर वर्तमान परिस्थितियां ऐसी ही रहीं तो मैं एक स्वतंत्र देश में पुनर्जन्म लेना चाहूंगा हूं। पुनर्जन्म का अर्थ अधूरे कार्यों को पूरा करना है। अगर 14वें दलाईलामा के निर्वासित जीवन मैं अपने कार्यों को पूरा नहीं कर पाया तो मैं भारत में पुनर्जन्म लेना चाहूंगा (कहते हुए वे गंभीर हो जाते हैं)। वैसे भी मैं खुद को भारत का पुत्र मानता हूं। मैंने बचपन से भारत के नालंदा विश्वविद्यालय के विद्वानों को पढ़ा है। कह सकता हूं कि मैं शारीरिक और मानसिक दोनों रूप से भारतीय हूं (भावुक होते हुए)। इसलिए, अब मै बदले में भारत को भी कुछ वापस देना चाहता हूं। इसलिए, मैं भारत के ज्ञान, अहिंसा, धार्मिक सद्भाव और धर्मनिरपेक्षता को विश्व भर में प्रचारित कर रहा हूं।
सवाल: अब ऐसा कहा जाने लगा है कि दलाईलामा नामक पवित्र परंपरा अब आपके साथ ही विदा हो जाएगी। आपके उत्तराधिकारी का मामला चीन और तिब्बत के लिए प्रमुख विषय है। क्या कहेंगे?
दलाईलामा: 1969 में मैने घोषणा की थी कि दलाईलामा संस्था को जारी रखना है या नहीं, यह तिब्बत के लोगों को तय करना है। यदि तिब्बत के लोगों को लगता है कि दलाईलामा संस्था की जरूरत नहीं तो कोई समस्या नहीं। जहां तक चीन की बात है तो वह मेरे उत्तराधिकारी को लेकर ज्यादा ही संवेदनशील रहता है (मजाकिया लहजे में)। दलाईलामा के पुनर्जन्म की जिम्मेदारी लेने से पहले चीन सरकार को पुनर्जन्म का सिद्धांत समझना और मानना होगा। क्योंकि, चीन सरकार पुनर्जन्म के सिद्धांत को तो मानती ही नहीं है।
सवाल: क्या आपकी मृत्यु के बाद चीन सरकार कठपुतली दलाईलामा घोषित कर सकती है?
दलाईलामा : चीन सरकार बिल्कुल ऐसा कर सकती है। वैसे भी चीन में दो दो पंचेन लामा हैं। एक पंचेन लामा को मैंने मान्यता दी है। और दूसरा पंचेन लामा कठपुतली के रूप में चीन सरकार ने आधिकारिक रूप से घोषित कर रखा है। हालांकि, मैंने सुना है कि चीन की ओर से घोषित पंचेन लामा अपनी शिक्षा को लेकर काफी गंभीर है। अगर ऐसा है तो यह अच्छा है।
क्या 15वीं दलाईलामा महिला हो सकती है?
सवाल: क्या 15वीं दलाईलामा महिला हो सकती है?
दलाईलामा: बिल्कुल हो सकती है। 15 साल पहले भी पेरिस में एक वुमन मैगजीन की रिपोर्टर ने साक्षात्कार के दौरान यह सवाल मुझसे पूछा था। तब भी मैने कहा था कि परिस्थितियों के अनुसार अगर महिला दलाईलामा की जरूरत हुई तो 15वीं दलाईलामा एक महिला भी हो सकती है। उस साक्षात्कार में मुझे फेमिनिस्ट यानी महिलावादी की संज्ञा दी गई।
सवाल: लेकिन, आपने अब यह भी शर्त लगा दी कि वह महिला खूबसूरत और आकर्षक होनी चाहिए। इस बयान के लिए आपकी बड़ी आलोचना हुई?
दलाईलामा: (हंसते हुए)। कुछ समय पहले लंदन में बीबीसी के साक्षात्कार के दौरान फिर मुझसे यही सवाल पूछा गया। मैंने कहा कि महिला दलाईलामा आएगी तो वह आकर्षक होनी चाहिए, लेकिन इससे कुछ समस्या पैदा हो गई। मैं कहना चाहता हूं कि दलाईलामा होने के नाते मुझ पर महिलाओं के आगे लाने की भी जिम्मेदारी है। आकर्षक महिला के मेरे भाव को गलत समझा गया। अगर रिकॉर्डिंग होगी तो मैंने उस साक्षात्कार में कहा था कि अगर दलाईलामा का चेहरा टेढ़ा होगा तो उसके पास कोई आएगा क्या (मुंह टेढ़ा बनाकर ठहाका लगाते हुए)।
सवाल : राजनीतिक शरण के लिए आपने भारत को ही क्यों चुना?
दलाईलामा : क्योंकि, दूसरा कोई विकल्प नहीं था। जब मैं तिब्बत से आया तो भारत और भूटान में शरण लेने के लिए निवेदन किया। शरण लेने के लिए भारत की धरती पहली पसंद थी। भारत ने हमारे निवेदन को स्वीकार कर लिया।
सवाल : आपकी रुचियां क्या-क्या हैं, कौन सी फिल्में देखते हैं?
दलाईलामा : जब मैं जवान था तो 1960 के दशक में मैंने दिल्ली और मुंबई में कुछेक बार कुछ फिल्में देखी थीं। उसके बाद एक बार दिल्ली में वार एंड पीस फिल्म देखी थी। वहां मुझे निमंत्रण मिला था। मेरा शौक बागवानी रहा है। बचपन में मुझे मेकेनिकी का भी शौक था (हंसते हुए)। एक बार तिब्बत में दो अमेरिकी महिलाएं मेरे पास फोटो खिंचवाने आईं तो उनका कैमरा अचानक खराब हो गया। तब एक महिला ने मुझसे पूछा कि क्या आप इसे ठीक कर सकते हो। मैंने कहा कि कोशिश करता हूं। तब किसी तरह मुझसे कैमरा अचानक ठीक हो गया। दूसरे दिन मुझे मेरा मेहनताना मिल गया (ठहाका लगाते हुए)। अब मैं बुजुर्ग हो गया हूं। अब मेरे दो ही शौक हैं। एक साधना और दूसरा पुस्तकें पढ़ना। मैं रोजाना पांच घंटे समाधि में रहता हूं। सुबह 3 बजे उठ जाता हूं। फिर चार घंटे ध्यान लगाता हूं। शाम को सोने से पहले एक घंटा फिर ध्यान लगाता हूं। मैं नालंदा विश्वविद्यालय के भारतीय विद्वानों नागार्जुन आदि की बहुत सी किताबें पढ़ता हूं। नालंदा के भारतीय विद्वानों का ज्ञान बहुत ही अद्भुत है।