पढ़िए, क्यों खंडहर बन गई रबींद्रनाथ टैगोर की रिहाइश
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हिल्स क्वीन शिमला में रबींद्रनाथ टैगोर की रिहाइश खंडहर में तबदील हो गई है। ऐतिहासिक ‘वुडफील्ड हाउस’ को देख कर लगता है कि एक मंजिला यह भवन कभी भी गिर सकता है। छत समेत पूरा भवन जर्जर हो चुका है।
शिमला आने वाले देश - विदेश के पर्यटक पूछते हैं कि टैगोर कहां ठहरे थे? लेकिन खंडहर में बदल रहे वुडफील्ड हाउस में देखने लायक अब कुछ खास नहीं बचा है। प्रदेश सरकार भी इसे सहेज नहीं पा रही है।
बालूगंज के पास इस वुडफील्ड हाउस के ऊपर एक बोर्ड लगा है। इसे हिमाचल के तत्कालीन मुख्य सचिव एमएस मुखर्जी ने 23 अप्रैल, 1993 को लगाया था। हिंदी और अंग्रेजी दोनों में ही सफेद पत्थर पर यह लिखा है कि टैगोर यहां कब आए? उन्होंने यहां क्या किया? लेकिन इसमें भी हरफ मिटने लगे हैं।
72 वर्षीय महिला ने सुनाई दास्तां
इस हेरिटेज भवन के जिस कमरे में रबींद्रनाथ टैगोर ने रचनाकर्म किया, उसमें एक 72 वर्षीय बुजुर्ग किरायेदार उर्मिला गुप्ता अकेले रहती हैं। वो यहां योगदा सोसाइटी का सत्संग आयोजित करती हैं। उन्होंने स्वामी परमहंस योगानंदा के चित्र के साथ टैगोर का फोटो भी रखा है।
दोनों फोटो की पूजा करती हैं। कोई आए और टैगोर के बारे में पूछे तो बताती हैं-बस! इसी कमरे में जहां मैं रहती हूं, टैगोर ठहरे थे। उर्मिला गुप्ता बताती हैं कि यह भवन अब निजी प्रापर्टी है।
इसके हिस्सेदार भी कई हैं। वह जिस कमरे में रहती हैं, टैगोर उसी में विश्राम करते थे। बाहर बरामदे में टहलते थे। यहीं लिखते-पढ़ते थे। कई साल पहले टैगोर के पोते यहां आए थे। वह रिनोवेशन की बात कर गए थे। राज्य भाषा एवं संस्कृति विभाग ने भी एक बार इसके लिए बजट देने की बात की थी, पर हुआ कुछ नहीं। जो कुछ भी किया अपने स्तर पर किया।
यहां लिखी थीं कविताएं
भाषा एवं संस्कृति विभाग के निदेशक अरुण शर्मा कहते हैं कि टैगोर शिमला स्थित इस भवन में रहे हैं। चूंकि, यह भवन निजी संपत्ति है, इसलिए भाषा एवं संस्कृति विभाग कुछ नहीं कर पा रहा। फिर भी देखेंगे कि टैगोर की इस याद को कैसे सहेजा जाए।
वर्ष 1893 के अक्तूबर और नवंबर महीने में इस भवन को रबींद्रनाथ टैगोर ने अपना निवास स्थान बनाया था। 1893-94 में उनके ज्येष्ठ भ्राता भारतीय नागरिक सेवा के प्रथम भारतीय तथा संगीतकार सत्येंद्रनाथ टैगोर ने इस भवन को लगभग आठ महीने के लिए किराये पर लिया था।
बंगाल महिला आंदोलन की प्रमुख उनकी पत्नी नंदिनी देवी और उनकी बेटी इंदिरा भी उनके साथ रहीं। रबींद्रनाथ टैगोर उनके साथ यहां रहे। इस मकान में रबींद्रनाथ टैगोर ने आठ कविताएं लिखीं। इन्हें बाद में उनके संग्रह ‘सोनार तारी’ में संकलित किया गया।