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सियासत: हाटी समुदाय को जनजातीय दर्जा दिलाने के मुद्दे पर अब भाजपा नेताओं में ठनी

Sat, 05 Feb 2022 02:30 AM IST
Krishan Singh अमर उजाला ब्यूरो, शिमला
अमर उजाला ब्यूरो, शिमला Published by: Krishan Singh Updated Sat, 05 Feb 2022 02:30 AM IST
सार

पूर्व सांसद और राज्य अनुसूचित जाति आयोग के अध्यक्ष वीरेंद्र कश्यप ने मौजूदा सांसद और भाजपा प्रदेशाध्यक्ष सुरेश कश्यप को सलाह दी है कि इस मुद्दे को लोगों और सरकार को साथ लेकर उठाने की जरूरत है। उन्होंने मौजूदा सांसद का नाम लिए बगैर अपने कार्यकाल की कई उपलब्धियां गिनाईं। 

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Politics: On the issue of giving tribal status to the Hati community, now the BJP leaders are involved
सुरेश कश्यप व वीरेंद्र कश्यप। - फोटो : अमर उजाला

विस्तार

हाटी समुदाय को जनजातीय दर्जा दिलाने के गिरिपार के लोगों के आंदोलन के बीच भाजपा नेताओं में ठन गई है। पूर्व सांसद और राज्य अनुसूचित जाति आयोग के अध्यक्ष वीरेंद्र कश्यप ने मौजूदा सांसद और भाजपा प्रदेशाध्यक्ष सुरेश कश्यप को सलाह दी है कि इस मुद्दे को लोगों और सरकार को साथ लेकर उठाने की जरूरत है। उन्होंने मौजूदा सांसद का नाम लिए बगैर अपने कार्यकाल की कई उपलब्धियां गिनाईं।  सुरेश कश्यप को वीरेंद्र कश्यप का टिकट काटकर पिछले लोकसभा चुनाव में शिमला संसदीय सीट से टिकट दिया गया था। गिरिपार के रेणुका, शिलाई, पच्छाद और पांवटा विधानसभा क्षेत्र के एक बड़े क्षेत्र के लोग उत्तराखंड के जौंसार की तर्ज पर खुद को जनजातीय घोषित करने की दशकों से मांग उठा रहे हैं। सोशल मीडिया में डाली पोस्ट में वीरेंद्र कश्यप ने लिखा कि इस आंदोलन का परिणाम तब तक नहीं मिल सकता, जब तक सरकार, सांसद और प्रभावित क्षेत्र के लोग मिलकर एक साथ काम नहीं करते।

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कश्यप ने कहा कि एक समय में यह आंदोलन मृत था। क्षेत्र के लोगों ने विश्वास खो दिया था कि उनकी उचित मांगों से कुछ भी हासिल नहीं किया जा सकता है, क्योंकि हिमाचल के सांसद और सरकार ने वोट के लिए अपनी त्वचा को लोगों से बचाने की औपचारिकता पूरी की है। सांसद के रूप में अपने कार्यकाल 2009-19 के दौरान उन्होंने संसद, आदिवासी मंत्रालय, आरजीआई, गृह मंत्रालय और प्रधानमंत्री के मंच पर बहुत गंभीरता से इस मुद्दे को उठाया।  उन्होंने राज्य सरकार की मशीनरी और इस क्षेत्र के स्थानीय निर्वाचित प्रतिनिधियों को पंचायत से जुटाया। बीडीसी, जिला परिषद और विधायक जिन्होंने उनके प्रयासों का समर्थन किया, कई बार उनके प्रतिनिधिमंडलों को दिल्ली ले जाया गया। इसमें दोनों सरकार के दो प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह और एनडीए के प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी शामिल रहे हैं, जिनके सामने ये मुद्दे उठाए गए। 

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