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Himachal: इंसानों में भी आ रहीं अब पौधों की बीमारियां, चिंता बढ़ी, कृषि विशेषज्ञों के अध्ययन में खुलासा

Thu, 29 Jan 2026 11:21 AM IST
Krishan Singh अमर उजाला ब्यूरो, शिमला।
अमर उजाला ब्यूरो, शिमला। Published by: Krishan Singh Updated Thu, 29 Jan 2026 11:21 AM IST
सार

 जिन रोगाणुओं को केवल पौधों तक सीमित माना जाता था, वे अब इंसानों में भी संक्रमण फैला सकते हैं।

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Plant diseases are now affecting humans too, raising concerns, according to a study by agricultural experts.
पाैधा(सांकेतिक) - फोटो : Freepik

विस्तार

अब तक जिन रोगाणुओं को केवल पौधों तक सीमित माना जाता था, वे अब इंसानों में भी संक्रमण फैला सकते हैं। यह चौंकाने वाला खुलासा अंतरराष्ट्रीय वैज्ञानिक जर्नल आर्काइव्स ऑफ माइक्रोबायलॉजी में प्रकाशित अध्ययन में किया गया है। यह अध्ययन बिना सीमाओं के पैथोजनः पौधों और इंसानों के पैथोजन के क्रॉस-किंगडम ट्रांसमिशन रणनीतियों और पैथोजेनिसिटी पर एक रिव्यू शीर्षक से प्रकाशित हुआ है। इस शोध में वैज्ञानिकों ने बताया है कि कुछ पौधों के रोगजनक बैक्टीरिया, फंगस और वायरस अवसर मिलने पर मानव शरीर को भी संक्रमित कर सकते हैं। विशेष रूप से उन लोगों को जिनकी रोग प्रतिरोधक क्षमता कमजोर होती है। वैज्ञानिक भाषा में इस प्रक्रिया को क्रॉस-किंगडम ट्रांसमिशन कहा जाता है, जिसमें रोगाणु एक जैविक साम्राज्य यानी पौधों से अन्यत्र यानी मनुष्यों में संक्रमण फैलाने की क्षमता विकसित कर लेते हैं। अध्ययन के अनुसार पैंटोआ, बर्खोल्डेरिया और एग्रोबैक्टीरियम जैसे बैक्टीरिया, तथा फ्यूसेरियम, एस्परगिलस और कर्क्युलरिया जैसे फंगस पौधों के साथ-साथ मानव स्वास्थ्य के लिए भी खतरा बन सकते हैं। इसके अलावा कुछ पौधों के वायरस जैसे टोबैको मोजेक वायरस और पेपर माइल्ड मॉटल वायरस को भी मानव संक्रमण से जोड़ा गया है।

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रिपोर्ट में ये भी सामने आया
इस रिपोर्ट में यह भी सामने आया है कि साल्मोनेला और एस्चेरिचिया कोलाई (ई. कोलाई) जैसे मानव रोगजनक बैक्टीरिया अब पौधों की जड़ों राइजोस्पीयर और पत्तियों फाइलोस्फीयर में भी पाए जा रहे हैं। इससे खाद्य सुरक्षा पर गंभीर सवाल खड़े हो गए हैं, क्योंकि कच्ची सब्जियों और फलों के माध्यम से ये रोगाणु सीधे मानव शरीर में प्रवेश कर सकते हैं। इस अध्ययन को हिमाचल प्रदेश के प्रतिष्ठित शैक्षणिक संस्थानों के वैज्ञानिकों ने मिलकर तैयार किया है। शोध दल में डॉ. नीतिका शर्मा, डॉ. जोगिंद्र पाल, डॉ. ऋषि महाजन, डॉ. शालिनी चंदेल, डॉ. दीपिका सूद और डॉ. अंजली सान्सपाल शामिल हैं। इनमें से अधिकांश वैज्ञानिक चौधरी सरवन कुमार हिमाचल प्रदेश कृषि विश्वविद्यालय पालमपुर के प्लांट पैथोलॉजी और माइक्रोबायोलॉजी विभाग से जुड़े हैं, जबकि डॉ. शालिनी चंदेल श्री साई विश्वविद्यालय, कांगड़ा के बॉटनी विभाग से हैं। इस अध्ययन को कृषि और बागवानी विभाग के अधिकारी गंभीरता से ले रहे हैं।

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वैज्ञानिकों के तर्क
 वैज्ञानिकों का कहना है कि पौधों और इंसानों की कोशिकाओं में कुछ समान आणविक और कोशिकीय संरचनाएं होती हैं, जिनका फायदा उठाकर ये रोगाणु नए मेजबान में प्रवेश कर लेते हैं। जलवायु परिवर्तन, वैश्वीकरण, अंतरराष्ट्रीय व्यापार और इम्यूनोसप्रेसिव बीमारियों के बढ़ते मामलों के कारण भविष्य में ऐसे संक्रमणों का खतरा और बढ़ सकता है। शोधकर्ताओं ने चेतावनी दी है कि भले ही अभी ऐसे मामले दुर्लभ हों, लेकिन यदि इन्हें नजरअंदाज नहीं किया जा सकता है। इससे निपटने के लिए वैज्ञानिकों ने वन हेल्थ दृष्टिकोण अपनाने पर जोर दिया है, जिसमें मानव स्वास्थ्य, पौधों का स्वास्थ्य और पर्यावरण तीनों को एक साथ जोड़कर देखा जाता है।

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