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कवायद: विलुप्त औषधीय पौधों से फार्मा कंपनियां बनाएंगी दवाएं, आईआईटी मंडी करेगा अध्ययन

Fri, 17 Dec 2021 10:42 AM IST
Krishan Singh संवाद न्यूज एजेंसी, मंडी
संवाद न्यूज एजेंसी, मंडी Published by: Krishan Singh Updated Fri, 17 Dec 2021 10:42 AM IST
सार

आईआईटी मंडी के शोधकर्ता मध्य हिमालय क्षेत्र में बिना पहचान वाले औषधीय पौधों की पहचान कर संस्थान वानस्पतिक उद्यान विकसित कर उन्हें व्यावसायिक तौर पर प्रचलित करने का अध्ययन करेंगे। स्टार्टअप के लिए आने वाली फार्मा कंपनियों को इनके औषधीय गुणों से अवगत करवाते हुए दवाओं में इस्तेमाल के लिए जागरूक करेंगे। 

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Pharma companies will make medicines from extinct medicinal plants
आईआईटी मंडी - फोटो : अमर उजाला

विस्तार

हिमालय क्षेत्रों में लुप्त हो रहे औषधीय पौधों का इस्तेमाल अब फार्मा कंपनियां दवाओं में करेंगी। आईआईटी मंडी के शोधकर्ता मध्य हिमालय क्षेत्र में बिना पहचान वाले औषधीय पौधों की पहचान कर संस्थान वानस्पतिक उद्यान विकसित कर उन्हें व्यावसायिक तौर पर प्रचलित करने का अध्ययन करेंगे। स्टार्टअप के लिए आने वाली फार्मा कंपनियों को इनके औषधीय गुणों से अवगत करवाते हुए दवाओं में इस्तेमाल के लिए जागरूक करेंगे। इससे ग्रामीण क्षेत्रों में रोजगार के द्वार भी खुलेंगे। इसकी शुरुआत मंडी से होने जा रही है।

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हिमाचल में लुप्त होने की कगार पर पहुंच चुके औषधीय पौधे चिरायता (सुरतिया चिरायता), वनककड़ी (पोडोफायाम हेसांडूम), कुटकी (पिकोरोहिजा) जटामानसी (नाइदोस्तचीज), अतीस (अकॉनितम हेटेरोपयोम), सुगंधवाला (वालेरिणा जटामासी) को संजोया जाएगा। स्टार्टअप के लिए आने वाली कंपनियों को इनके इस्तेमाल के लिए चुना जाएगा। निजी क्षेत्र से आईआईटी मंडी के स्कूल ऑफ बेसिक साइंसेज को यह प्रोजेक्ट मिला है। इसे लेकर एक कंपनी भी तैयार की जा रही है। निदेशक आईआईटी मंडी डॉ. अजीत कुमार चतुर्वेदी के अनुसार कुछ औषधीय पौधों का अध्ययन किया जा चुका है। इस संबंध में आईआईटी प्रयासरत है।
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रोहतांग, चंबा और शिमला में पाए जाने वाले पौधे कुटकी औषधीय पौधे को कड़वा होने के कारण कड़ू भी कहा जाता है और यह रोहतांग के उस पार मिलता है। लिवर के रोग दूर करने में इसे बेहद प्रभावी माना जाता है, इसीलिए दवा कंपनियां इसे प्रयोग करती हैं। जटामानसी हिमालय क्षेत्र में उगने वाला एक सपुष्पी औषधीय पौधा है। इसका उपयोग तीक्ष्ण गंध वाला इत्र बनाने में होता है। यह बाल के रोगों के लिए प्रयुक्त माना जाता है। अतीस शिमला और चंबा में पाया जाता है। यह पौधा कफ, पित्त, अतिसार, आम, विष, खांसी और कृमि रोग को नष्ट करने वाला है।
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इनके औषधीय गुण भी कमाल के
चिरायता हिमाचल प्रदेश में 4 से 10 हजार फीट की ऊंचाई पर होता है। बुखार और रक्त दोषों की इसे सर्वश्रेष्ठ औषधि माना गया है। वनककड़ी फेफड़े की बीमारी में बेहद कारगर होती है। यह मंडी, सोलन आदि क्षेत्रों में पाई जाती है। सुगंधबाला मंडी, चंबा, कुल्लू, लाहौल स्पीति में पाया जाता है। यह कड़वा, छोटा, लघु, रूखा और ठंडे तासीर का होता है। यह पित्त और कफ कम करनेवाला, पाचक शक्ति और खाने की रुचि बढ़ाने वाला, जलन और बार-बार प्यास लगने की इच्छा कम करने वाला तथा घाव को जल्दी सूखाने में मदद करनेवाला होता है। इसके अलावा सुगंधबाला उल्टी, दिल की बीमारी, बुखार, कुष्ठ, अल्सर, नाक-कान से खून बहना, खुजली तथा जलन से राहत दिलाने में मदद करता है।

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