Himachal: पवन चक्की के ब्लेड से बना सकेंगे ग्लास फाइबर, गाड़ियों के इंटीरियर, आईआईटी मंडी को मिली सफलता
निरंतर एक्सेस के लिए सब्सक्राइब करें
अमर उजाला प्रीमियम लेख सिर्फ रजिस्टर्ड पाठकों के लिए ही उपलब्ध हैं
अमर उजाला प्रीमियम लेख सिर्फ सब्सक्राइब्ड पाठकों के लिए ही उपलब्ध हैं
विस्तार
हिमाचल प्रदेश के भारतीय प्रौद्योगिकी संस्थान मंडी के शोधकर्ताओं ने पर्यावरण को प्रदूषित करने वाले पवन चक्की के ब्लेड के कचरे को रिसाइकल कर ग्लास फाइबर (प्लास्टिक) बनाने में सफलता हासिल की है। फाइबर के रेशे कांच के होंगे। इस कारण यह प्लास्टिक हल्का होने के साथ मजबूत भी होगा। इसका प्रयोग पानी की टंकियों, गाड़ियों के इंटीरियर और निर्माण, नावों की संरचना, नहाने के टब-बाल्टियां, घरों की छतों में किया जा सकेगा। इससे पहले भारत में पवन चक्की के ब्लेड को रिसाइकल करने की कोई प्रक्रिया नहीं थी। शोध के निष्कर्ष रिसोर्सेज कंजर्वेशन एंड रीसाइक्लिंग नामक जर्नल में प्रकाशित किए गए हैं। 2024 और 2034 के बीच पूरी दुनिया में विंड टरबाइन ब्लेड से लगभग 200,000 टन कंपोजिट कचरा उत्पन्न होने का अनुमान है।
भारत पवन बिजली संयंत्र लगाने में चौथे स्थान पर
आईआईटी मंडी के स्कूल ऑफ मेकेनिकल एंड मैटीरियल्स इंजीनियरिंग के सहायक प्रोफेसर डॉ. सनी जफर और केमिकल साइंसेज के एसोसिएट प्रोफेसर डॉ. वेंकट कृष्णन ने इस शोध का खुलासा किया है। उन्होंने बताया कि भारत पवन बिजली संयंत्र लगाने में चौथे स्थान पर है। हवा से बिजली तैयार करने के दृष्टिकोण से देश के अहम क्षेत्रों में विंड टर्बाइन (विंडमिल्स) लगाए जाते हैं, लेकिन विंड मिल के ब्लेड को रिसाइकल करने की कोई विधि नहीं थी।
पवन चक्की के ब्लेड के निस्तारण से फैल रहा प्रदूषण
शोधार्थी प्रियंका और मनजीत ने बताया कि पूरी दुनिया में पवन बिजली जैसी अक्षय ऊर्जा अपनाने पर जोर दिया जा रहा है। जीवाश्म ईंधन आधारित ऊर्जा से होने वाले नुकसान कम हों, लेकिन पवन चक्की के ब्लेड का निस्तारण करने से पर्यावरण में प्रदूषण तेजी से फैल रहा है। पवन चक्की के ब्लेड पॉलिमर कंपोजिट से बने होते हैं। इस पॉलिमर सिस्टम को मजबूत बनाने के लिए कार्बन फाइबर और ग्लास फाइबर इस्तेमाल किए जाते हैं। इन्हें नष्ट करने के लिए या तो जमीन में गाड़ दिया जाता है या फिर जला दिया जाता है, लेकिन कचरा निपटाने के दोनों तरीके पर्यावरण में प्रदूषण बढ़ाते हैं और खर्चीले हैं।
सिरके का किया गया प्रयोग
रिसाइकल प्रोसेस में सिरका अहम भूमिका निभाएगा। डॉ. सनी जफर ने कहा कि इसमें हाइड्रोजन पेरोक्साइड और एसिटिक एसिड के साथ जीएफआरपी कंपोजिट के रासायनिक अपघटन में माइक्रोवेव का उपयोग किया है। हाइड्रोजन पेरोक्साइड और एसिटिक एसिड दोनों पर्यावरण के लिए स्वच्छ रसायन हैं। पहले का उपयोग व्यापक स्तर पर कीटाणुनाशक/ एंटीबायोटिक के रूप में होता है और दूसरा विनेगर सिरका है।