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सीने से बह रहा था लहू मगर दुश्मनों को मिटाकर ही लौटे ये 'परमवीर'

Sun, 16 Aug 2015 09:41 AM IST
Updated Sun, 16 Aug 2015 09:41 AM IST
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paramvir chakra: exclusive story of vikram batra, somnath and sanjay kumar.

देश आज आजादी का दिन मना रहा है। ऐसे में हम उन वीर जवानों को कैसे भूल सकते हैं जिन्होंने इस आजादी और देश की माटी की खातिर अपनी जान तक दांव पर लगा दी थी। आज आपको ऐसे ही परमवीरों से मिलाते हैं जिनकी बहादुरी को आप भी सलाम करेंगे।

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परमवीर चक्र विजेता संजय ने कारगिल युद्ध के दौरान न केवल देश के दुश्मनों को हमेशा के लिए मौत की नींद सुलाया, बल्कि प्वाइंट 4875 पर तिरंगा भी फहराया। हिमाचल के बिलासपुर जिले की कलोल पंचायत के बकैण गांव के संजय कुमार का जन्म 3 मार्च, 1976 को हुआ।
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वर्ष 1998 में वे 13 जैक राइफल में बतौर लांस नायक भर्ती हुए। अब तक देश के कुल 21 जांबाजों को यह सम्मान मिला है। इनमें सात सपूत वे हैं, जिन्हें जीवित रहते यह सम्मान मिला संजय का नाम भी इनमें शामिल है।
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दुश्मनों को उनके बंकर में घुसकर मारा

paramvir chakra: exclusive story of vikram batra, somnath and sanjay kumar.

कारगिल युद्ध में मशकोह घाटी के मोर्चे पर भेजे गए संजय ने आमने-सामने की लड़ाई में तीन घुसपैठियों को ढेर कर दिया। हालांकि, जवाबी फायरिंग में स्वयं संजय भी बुरी तरह से घायल हो गए। जख्मों से रिसते लहू की परवाह किए बगैर इस जांबाज ने दूसरा मोर्चा संभालते हुए फिर से देश के दुश्मनों पर हमला कर दिया।

दुश्मन इससे पहले कि कुछ समझ पाते, संजय की आग उगलती राइफल ने उन्हें हमेशा के लिए शांत कर दिया। कारगिल युद्ध के इस हीरो को वर्ष 2000 में तत्कालीन राष्ट्रपति केआर नारायणन ने सर्वोच्च सैन्य सम्मान परमवीर चक्र से सम्मानित किया।

इस परमवीर के परिजन किसे दिखाएं अपना दर्द

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वहीं, टाइगर हिल (कारगिल) की 4875 चोटी को फतह कर शहादत का जाम पीने वाले शहीद कैप्टन विक्रम बत्तरा का नारा दिल मांगे मोर आज भी हर किसी की जुबान पर है। कैप्टन विक्रम बत्तरा की शहादत पर भारत सरकार ने उन्हें परमवीर चक्र से नवाजा था, लेकिन देश के लिए कुर्बानी देने वाले इस शहीद के परिजन आज भी कई बातों को लेकर खफा हैं।

परिजनों का कहना है कि पालमपुर में लगी शहीद की प्रतिमा का रंग-रूप उनके बेटे से नहीं मिलता है। इसे आज तक नहीं बदला गया। बत्तरा के नाम पर आज तक पालमपुर में न तो कोई बड़ा चौक है और न ही कोई सड़क। पिता जीएल बत्तरा का कहना है कि उन्होंने कई बार राज्य और केंद्रों सरकार से यह मुद्दा उठाया है।

अपने ही घर में अंजान देश के पहले परमवीर

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देश के पहले परमवीर चक्र विजेता शहीद मेजर सोमनाथ शर्मा को अपने ही प्रदेश की सरकारों से सम्मान नहीं मिला। 67 वर्ष बाद भी मेजर सोमनाथ शर्मा के नाम पर सरकार ने सिर्फ एक सड़क और पालमपुर के आर्मी कैंप का एक गेट बनवाया है।

31 जनवरी, 1923 को कांगड़ा जिले के चामुंडा स्थित गांव डाढ में जन्में मेजर सोमनाथ के पैतृक गांव में शहीद के नाम पर न तो कोई संग्रहालय है और न ही उनकी बहादुरी की कथा बताने वाला कोई बोर्ड। गांव में सोमनाथ शर्मा का पैतृक मकान है। वर्तमान में इस मकान में कोई भी नहीं रहता है।

मेजर सोमनाथ ने अक्तूबर-नवंबर 1947 के भारत-पाक संघर्ष में अपनी वीरता से शत्रुओं के छक्के छुड़ा दिए थे। उन्हें भारत सरकार ने मरणोपरांत देश के सर्वोच्च सम्मान परमवीर चक्र से सम्मानित किया। विधानसभा अध्यक्ष बृज बिहारी बुटेल ने कहा कि वे परमवीर चक्र विजेता मेजर सोमनाथ शर्मा की शहादत को नमन करते हैं।

थापा की बहादुरी को आप भी करेंगे सलाम

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10 अप्रैल, 1928 को शिमला में जन्में ले. कर्नल धन सिंह थापा 8 गोरखा राइफल रेजिमेंट में तैनात थे। भारत-चीन युद्ध के दौरान दुश्मन के छक्के छुड़ाने वाले थापा को भारत सरकार ने परमवीर चक्र से सम्मानित किया है। थापा भी उन सात जांबाजों में शुमार हैं, जिन्हें जीवित रहते यह सम्मान मिला। ले. कर्नल धन सिंह थापा ने 1962 के भारत चीन युद्ध के दौरान लद्दाख की सिरिजप घाटी से दुश्मनों को खदेड़ दिया था।

अपनी बहादुरी से देश की रक्षा करने वाले इन वीर जवानों को आज सरकारें भूल रही है। इनकी और इनके परिवारों की कोई सुध लेने वाला तक नहीं। महज आश्वासनों के कुछ नहीं मिलता। पहले इन जवानों ने देश के दुश्मनों से लड़ाई लड़ी। अब इनके परिजन सरकार की अनदेखी के खिलाफ लड़ाई लड़ने को मजबूर है।

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