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Minjar Fair: कभी सरहद पार पाकिस्तान तक सुनाई देती थी मिंजर मेले की गूंज, पढ़ें रोचक जानकारी

Sat, 29 Jul 2023 02:07 PM IST
Krishan Singh सुभाष कुमार अग्निहोत्री, संवाद न्यूज एजेंसी, चंबा
सुभाष कुमार अग्निहोत्री, संवाद न्यूज एजेंसी, चंबा Published by: Krishan Singh Updated Sat, 29 Jul 2023 02:07 PM IST
सार

 चंबा मिंजर मेले की गूंज पाकिस्तान तक सुनाई देती रही है। कई दशक तक यह परंपरा कायम रही। जिस तरह से यहां मिंजर मेला मनाया जाता है, उस तरह से वहां भी मनाया जाता रहा है। 

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Once upon a time the echo of Minjar fair was heard across the border to Pakistan
चंबा मिंजर मेला(फाइल) - फोटो : अमर उजाला

विस्तार

विभाजन के बाद भी चंबा मिंजर मेले की गूंज पाकिस्तान तक सुनाई देती रही है। कई दशक तक यह परंपरा कायम रही। जिस तरह से यहां मिंजर मेला मनाया जाता है, उस तरह से वहां भी मनाया जाता रहा है। वक्त बदला, निजाम बदले और समय के साथ यह रिवायत भी बदल गई। मुस्लिम राजा इकबाल की मौत के बाद 1992-93 से पाकिस्तान में यह परंपरा बंद हो चुकी है। अब सिर्फ मिंजर मेले में बजाए जाने वाले वाद्य यंत्रों की गूंज चंबा की वादी में ही सुनाई देती है। 

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जानकारी के मुताबिक वर्ष 1992 तक पाकिस्तान के रावलपिंडी जिले के कोहटा स्थित मोहल्ला कश्मीरी में चंबा जिले की भांति ही मिंजर मेले को पूरे हर्षोल्लास के साथ मनाया जाता रहा। 
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बताया जाता है कि वर्ष 1947 में देश आजाद होने के बाद पाकिस्तान में बसे चंबा के लोगों के साथ मिंजर मनाने की परंपरा शुरू की गई। तत्कालीन मुस्लिम शासक इकबाल और वहां कार्यरत शरीफ ने कैलाश चंद महाजन के पिता समेत यहां के लोगों को इस्लामाबाद आमंत्रित किया। साथ ही शर्त रखी कि लोगों को अपने खर्चे पर ही इस्लामाबाद आना होगा। इस्लामाबाद में मिंजर मेला मनाने के लिए पहुंचे लोगों के खाने के लिए चंबा की तरह ही व्यंजन (बबरू, माश की दाल, धुली मूंग, कड़ी, खट्टा) बनाए गए। इतना ही नहीं, तत्कालीन शासक ने अपने मकान के एक कमरे में संग्रहालय भी तैयार करवाया है।
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जिसमें रेशम के धागों से बनाई गई मिंजर, लकड़ी, बांस से बनाई जाने वाली टोकरियां, गहने संग्रहीत किए गए हैं, लेकिन वर्ष 1992-93 में मुस्लिम राजा इकबाल की मौत के बाद पाकिस्तान में मिंजर मेले की परंपरा भी बंद हो गई। देश से बाहर पाकिस्तान में मिंजर मेला मनाने के लिखित में प्रमाण  भी हैं। आजादी के बाद पाकिस्तान जाकर बसे चंबा के लोगों की ओर से चंबा में रहने वाले अपने रिश्तेदारों को भेजे गए पत्र इस समृद्ध परंपरा की तसदीक करते हैं। चंबा में रहने वाले लोगों के पास यह पत्र आज भी मौजूद हैं। इन पत्रों में भी जानकारी है कि इस्लामाबाद के शासक इकबाल  अपनी प्रजा के सुख-दुख और तीज-त्योहारों को मनाने के लिए उसमें शरीक हुआ करते थे।


नप चंबा के रिकॉर्ड में दर्ज है पाकिस्तान का न्योता
86 वर्षीय सरदार मोहम्मद खोखर ने बताया कि कि नगर परिषद चंबा के रिकॉर्ड में मिंजर को पाकिस्तान में मनाए जाने की बात आज भी दर्ज है। पाकिस्तान (रावलपिंडी) से नप चंबा के अध्यक्ष पंडित सरदारी लाल को पत्र लिख कर मिंजर मेले के लिए आमंत्रित किया गया था। देश आजाद होने पर वर्ष 1947 में उनके कई रिश्तेदार पाकिस्तान जाकर बसे थे। उनके रिश्तेदार पत्र लिख कर अक्सर रावलपिंडी के कोहटा स्थित कश्मीरी मोहल्ला में मनाए जाने वाले मिंजर मेले का जिक्र किया करते थे। कहा कि लाहौर में लक्ष्मण सिंह किला वर्तमान में भी मौजूद है। जहां पर लोग एकत्रित होकर मिंजर मेला मनाते रहे। कुंजड़ी मल्हार गायन के बाद मिंजर संपन्न होने पर बाकायदा रावी नदी में मिंजर विसर्जन करने के बाद चंबा की यादों को याद कर रोते हैं।

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