Himachal: अब सोलर सेल बनाना हुआ आसान और सस्ता, आईआईटी मंडी के शोधकर्ताओं ने विकसित की तकनीक
हिमाचल के आईआईटी मंडी के शोधकर्ताओं ने मेटल ऑक्साइड लेयर बनाने की तकनीक विकसित की है। इस तकनीक से प्रयोग से आधुनिक आर्किटेक्चर वाले सिलिकॉन फोटोवोल्टिक उपकरण बनाने की प्रक्रिया भी सरल होगी और व्यावसायिक तकनीकों की लागत और जटिलता भी कम होगी।
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अब सोलर सेल बनाना आसान और सस्ता होगा। इसके लिए हिमाचल के आईआईटी मंडी के शोधकर्ताओं ने मेटल ऑक्साइड लेयर बनाने की तकनीक विकसित की है। इस तकनीक से प्रयोग से आधुनिक आर्किटेक्चर वाले सिलिकॉन फोटोवोल्टिक उपकरण बनाने की प्रक्रिया भी सरल होगी और व्यावसायिक तकनीकों की लागत और जटिलता भी कम होगी। शोध के परिणाम मैटेरियल्स साइंस, मैटेरियल्स इन इलेक्ट्रॉनिक्स जर्नल में प्रकाशित किए गए हैं। आधुनिक आर्किटेक्चर वाले सिलिकॉन सोलर सेल्स में को बनाने के लिए सेमीकंडक्टरों में मेटल ऑक्साइड महत्वपूर्ण हैं। इसके लिए निकेल ऑक्साइड फिल्में तैयार करना जरूरी होती हैं, जिनकी मोटाई नैनोमीटर रेंज में होती हैं।
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व्यावसायिक उपयोग की संभावना कम
वर्तमान में नैनोमीटर में निकेल ऑक्साइड की बारीक फिल्म बनाने की प्रक्रिया अत्याधिक महंगी है। इसके उत्पादन को प्रयोग किए जाने वाले उपकरण आयात करने होते हैं। इतना ही नहीं इन फिल्मों के विकास के लिए उपयोग किए जाने वाले प्रीकर्सर जैसे कि निकेल एसिटाइलसीटोनेट भी बहुत महंगे हैं। इसलिए इस तकनीक के व्यावसायिक उपयोग की संभावना कम हो जाती है। बता दें कि सौर सेल से बनी सोलर पैनलों का प्रयोग उस स्थान पर किया जाता है जहां विद्युत ऊर्जा का कोई स्रोत नहीं है। इन पैनलों की सहायता से प्रकाश ऊर्जा को विद्युत ऊर्जा में परिवर्तन करके, लाइट, बल्ब और टीवी आदि उपकरण चलाए जा सकते हैं।
इस तरह से तैयार की गई तकनीक
आईआईटी मंडी के शोधकर्ताओं ने मेटल ऑक्साइड की अल्ट्राथिन फिल्म बनाने की सस्ती प्रक्रिया विकसित की है। इसकी शुरुआती सामग्रियां भी सस्ती हैं। उन्होंने सिलिकॉन सब्सट्रेट पर निकेल ऑक्साइड की बारीक फिल्म बनाने के लिए एयरोसोल की मदद से रासायनिक भाप जमाने की तकनीक का इस्तेमाल किया है। डॉ. कुणाल घोष ने बताया कि एरोसोल की मदद से रसायनिक भाप जमाने की तकनीक से सिलिकॉन सहित विभिन्न सतहों पर उच्च गुणवत्ता के साथ एक समान बारीक फिल्म बनाई जा सकती है। इसके लिए एयरोसोल के रूप में भाप अवस्था में प्रीकर्सर इस्तेमाल करना होगा।
प्रोजेक्ट अभी शुरुआती दौर पर
अभी यह प्रोजेक्ट प्रौद्योगिकी तैयार स्तर (टीआरएल) 3 पर है। जिसका अर्थ है कि यह अभी विकास के शुरुआती दौर में है। हालांकि और विकास और टीआरएल स्तर बढ़ाने के साथ यह तकनीक उद्योग में अपनाए जाने योग्य होगी। इस शोध से आधुनिक आर्किटेक्चर के सिलिकॉन फोटोवोल्टिक उपकरण बनाने की प्रक्रिया बेहतर होगी। वर्तमान व्यावसायिक तकनीकों की तुलना में इसमें लागत और जटिलता भी कम होगी।
यह एक नई पद्धति: डॉ. कुणाल घोष
शोधकर्ता टीम के प्रमुख एसोसिएट प्रोफेसर डॉ. कुणाल घोष ने इस सफलता को अहम बताते हुए कहा कि हमने शोध से यह देखा है कि इस प्रक्रिया से सोलर सेल्स के लिए मेटल ऑक्साइड फिल्म उत्पादन की लागत कम हो सकती है और इसका व्यापक उपयोग किया जा सकता है। यह एक नई पद्धति है। जिसमें उत्पादन की प्रचलित तकनीकों की लागत और जटिलता कम करने और सौर उद्योग में नया दौर शुरू करने की संभावना है। पीएचडी स्कॉलर सैयद मोहम्मद हुसैन और मोहम्मद सादुल्लाह ने मिल कर यह शोध पत्र तैयार किया है।