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एकतरफा मेडिपर्सन बिल को लेकर पब्लिक में गुस्सा, लगाएंगे गुहार

Sat, 01 Apr 2017 11:48 PM IST
अमर उजाला ब्यूरो, शिमला
अमर उजाला ब्यूरो, शिमला Updated Sat, 01 Apr 2017 11:48 PM IST
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New mediperson bill in himachal pradesh

डाक्टरों अथवा चिकित्सा सेवा कर्मियों की सुरक्षा के एकतरफा विधेयक को पारित करने से नाराज लोग अब इसे पारित होने से रोकने के प्रयास में राजभवन शिमला से गुहार लगाएंगे। मेडिपर्सन एक्ट को राज्यपाल की मंजूरी के बाद कानून बनने से रोकने को हिमाचल के बुद्धिजीवी और जागरूक लोगों ने सिविल सोसाइटी बनाने की भी तैयारी कर ली है।

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सोशल मीडिया पर भी इस संबंध में जमकर बहस छिड़ गई है। आम जनता इसके मौजूदा स्वरूप के विरोध में खड़ी नजर आ रही है। बजट सत्र के आखिरी दिन शुक्रवार को हिमाचल प्रदेश विधानसभा में मेडिपर्सन बिल को पारित किया गया है। डॉक्टरों या इसी तरह के चिकित्सा सेवाकर्मियों से अगर किसी मरीज की किन्हीं कारणों से झड़प हो जाती है।
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अगर ये हिंसा की परिभाषा में आएगी तो उसे सीधे सलाखों के पीछे जाना होगा, क्योंकि अब ये गैर जमानती सजा होगी। आरोप साबित होने पर तीन साल की कैद होगी। इस कानून को सत्ता पक्ष ने ध्वनिमत से पारित कर दिया। भाजपा के मुख्य सचेतक सुरेश भारद्वाज ने सदन में इस विधेयक को एकतरफा बताकर इसके दुरुपयोग की आशंका जरूर जताई, मगर बजट पारण के समय सत्ता पक्ष और विपक्ष के मौन के बाद उनकी आवाज भी दबी रह गई।
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स्वास्थ्य मंत्री कौल सिंह ठाकुर ये सफाई दे रहे हैं कि इसमें सेफगार्ड लगा दिया गया है कि शिकायत डॉक्टर सीधे नहीं करेंगे। ये संस्थान से अधिकृत अधिकारी जैसे एमएस या अन्य के माध्यम से ही होगी। आमतौर पर चिकित्सकों की यूनियनों के दबाव में रहने वाले ऐसे अधिकारी जनता के खिलाफ किसी भी शिकायत पर तटस्थता से विचार कर पाएंगे। ये भी बड़ा सवाल है। 

किसने क्या प्रतिक्रिया दी 
‘अगर पब्लिक सर्वेंट पर ड्यूटी के दौरान हमला होता है तो आईपीसी की धारा 353 में भी पहले से ही कड़ा प्रावधान है। ये कदम पब्लिक सर्वेंट्स से सहानुभूति हासिल करने के लिए ही किया गया है। कल अन्य वर्गों से भी ऐसी ही मांग उठेगी। शासन का जनता के सरोकारों से कोई मतलब नहीं है।’
- आईडी भंडारी, पूर्व डीजीपी एवं पूर्व सीआईडी प्रमुख, हिमाचल प्रदेश। 

‘कब तक जनता सहनशीलता दिखाएगी। कभी भगवान अस्पताल के चक्कर दुश्मनों को भी न लगवाएं। अस्पताल में तो कर्मचारी भी इस तरह चिल्लाते हैं, जैसे एचओडी भी वही हों। मरीजों के लिए भी कोई प्रावधान किया जाए तो समझें कि अच्छी राजनीति है। नहीं तो वोट बैंक... कोई विधायक, मंत्री अस्पताल जाता है तो पूरा केबिन खाली किया जाता है पूरी रोड खाली की जाती है। बाकी सब रहो लाइन में। कब सुधार हो पता नहीं...’
- श्रीलाल बहादुर शास्त्री संस्कृत विद्यापीठ, नई दिल्ली। 

‘मैं इससे सहमत हूं। ये आम आदमी के हित में कोई अच्छा कानून नहीं है।’
- कुलदीप सिंह राठौर, जाने-माने अधिवक्ता और कांग्रेस के पूर्व प्रदेश महासचिव। 

‘यह दुख है। भले ही चिकित्सक भगवान के बाद दूसरा वह मसीहा होता है जो जीवन देता है, लेकिन यदि वह अपने कर्त्तव्य के प्रति सचेत नहीं हैं तो निश्चय ही वह इस पदवी के काबिल नहीं हैं। उन्हें अपने कर्त्तव्य के प्रति ईमानदारी से सचेत होना पड़ेगा, जिसकी कमी आज महसूस होती है। जनता इस लिए टैक्स चुकाती है कि सरकार उन्हें मूलभूत सुविधाएं प्रदान करे न कि तानाशाही या नौकरशाही को जनता के ऊपर लादे। अगर ऐसे कानून बनेंगे तो जनता क्या करेगी? इसे सरकार के पैरोकारों को अच्छी तरह समझ लेना चाहिए।’- हेमानंद शर्मा ‘अरुण भारती’, साहित्यकार। 


‘रोगी और तीमारदार की शिकायत सुनने और डॉक्टर को कटघरे खड़ा करने वाला अधिकारी जब तक नहीं होगा, तब तक सरकार का यह कानून एकतरफा है। इसके विरुद्ध सिविल सोसाइटी अपना पक्ष रखे। मैं साथ हूं। इस बारे में सिविल सोसाइटी का गठन किया जाएगा। - मोहिंद्र प्रताप सिंह राणा, वरिष्ठ पत्रकार एवं लेखक

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