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हिमाचल: बागवानों को करोड़ों की कमाई का उपदेश, खुद की जमीन बेकार; 397.27 हेक्टेयर भूमि खेती के उपयोग में नहीं

Wed, 14 Oct 2026 11:33 AM IST
Ankesh Dogra सुरेश शांडिल्य, शिमला।
सुरेश शांडिल्य, शिमला। Published by: Ankesh Dogra Updated Wed, 14 Oct 2026 11:33 AM IST
सार

डॉ. वाईएस परमार बागवानी एवं वानिकी विश्वविद्यालय, नौणी के पास कुल 773.91 हेक्टेयर जमीन है, जिसमें से 397.27 हेक्टेयर भूमि खेती के उपयोग में नहीं होने का मामला सामने आया है। विश्वविद्यालय ने शोध, शिक्षा और भूमि की अनुपयुक्तता को इसकी वजह बताया है। दूसरी ओर, हिमाचल के बागवान उन्नत किस्मों के फलदार पौधों के लिए विदेशों पर निर्भर हैं। 

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Nauni University 397 hectares unused land Himachal horticulture farmers
डॉ. वाईएस परमार बागवानी एवं वानिकी विश्वविद्यालय नौणी - फोटो : अमर उजाला नेटवर्क

विस्तार

हिमाचल में बागवानों को एक हेक्टेयर क्षेत्र में बगीचा लगाकर लाखों रुपये कमाने के सपने दिखाने वाले डॉ. वाईएस परमार बागवानी एवं वानिकी विश्वविद्यालय नौणी के पास 397.27 हेक्टेयर जमीन बेकार पड़ी है। इस पर न खेती की जा रही है, न बगीचा है और न ही कोई नर्सरी तैयार की गई है। विवि को हर साल सरकार से अनुदान की दरकार रहती है। विश्वविद्यालय के पास कुल 773.91 हेक्टेयर जमीन है। इसमें से करीब 397.27 हेक्टेयर यानी 51.33 फीसदी जमीन का सही उपयोग नहीं हो रहा है। विश्वविद्यालय की अपने सभी स्रोतों से आय 33.31 से 50 करोड़ रुपये के आसपास ही बैठती है। विश्वविद्यालय को कर्मचारियों के वेतन-भत्तों, आकस्मिक खर्च और आपूर्ति एवं सेवाओं समेत विभिन्न मदों के लिए सरकार से अनुदान मिलता है। बढ़े हुए खर्चों और नई योजनाओं के लिए भी सरकारी सहायता उपलब्ध कराई जाती है। 

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विश्वविद्यालय की एक रिपोर्ट में 773.91 हेक्टेयर भूमि इसके पास होने का उल्लेख है जिसे हाल ही में विधानसभा सचिवालय के समक्ष भी रखा गया। इस रिपोर्ट में 397.27 हेक्टेयर भूमि खेती के इस्तेमाल में नहीं होने पर विश्वविद्यालय के स्तर पर उपलब्ध संसाधनों का अधिकतम उपयोग कर आय बढ़ाने की जरूरत बताई गई। यह रिपोर्ट राज्य लेखा परीक्षा विभाग की आपत्तियों के जवाब में बनाई गई है। इस रिपोर्ट में विश्वविद्यालय का कहना है कि उसकी करीब आधी कृषि भूमि वैज्ञानिकों के प्रयोग, स्नातकोत्तर शोधार्थियों के अनुसंधान और स्नातक विद्यार्थियों की व्यावहारिक फील्ड ट्रेनिंग के लिए इस्तेमाल होती है। शेष भूमि पर सब्जियों की खेती, फलदार बाग और फल एवं वन पौधों की नर्सरी विकसित की जा रही है। करीब 30 हेक्टेयर जमीन पर फल, नर्सरी पौधे, वन पौधे, सब्जियों और दालों की सघन खेती शुरू की गई है। इसके बावजूद यह क्षेत्र काफी कम है।

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बागवान विदेश से ला रहे हैं पौधे नौणी में नहीं बन पाई बड़ी नर्सरी
हिमाचल के बागवान उन्नत किस्म के फलदार पौधों के लिए विदेशों पर निर्भर हैं। हॉलैंड, इटली समेत दूसरे देशों से पौधे मंगवाए जा रहे हैं। आयातित पौधे की कीमत करीब 900 से 1,000 रुपये प्रति पौधा भी है। दूसरी ओर, बागवानी एवं वानिकी के क्षेत्र में विशेषज्ञता रखने वाले नौणी विश्वविद्यालय के पास जमीन और शोध की क्षमता होने के बावजूद बड़े पैमाने पर ऐसी पौध तैयार करने की व्यवस्था विकसित नहीं हो पाई है।

मंत्री बोले, अनुपयुक्त भूमि के बेहतर इस्तेमाल पर किया जाएगा सर्वेक्षण
विवि का तर्क है कि पूरी जमीन को व्यावसायिक खेती में नहीं बदला जा सकता। कुछ भूमि शोध, शिक्षा और प्रशिक्षण के लिए जरूरी है, जबकि विश्वविद्यालय का बड़ा हिस्सा जंगल से घिरा होने के कारण दूसरे उपयोग के लिए उपयुक्त नहीं है। फिर भी जिस भूमि का शैक्षणिक गतिविधियों पर असर डाले बिना इस्तेमाल किया जा सकता है, वहां आय बढ़ाने की संभावनाएं तलाशी जा सकती हैं। इस संबंध में, बागवानी मंत्री जगत सिंह नेगी ने कहा कि विश्वविद्यालय की अनुपयुक्त भूमि का रिकॉर्ड लिया जाएगा। सर्वेक्षण कर देखा जाएगा कि जमीन का किस तरह उपयोग संभव है।
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