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सैकड़ों साल पहले भी इस काम में दक्ष थे किन्नौर-लाहौल के लोग
ब्यूरो/अमर उजाला, शिमला
Updated Tue, 24 Nov 2015 12:43 PM IST
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सैकड़ों साल पहले भी किन्नौर और लाहौल के लोग धातु ढालने में उतने ही दक्ष थे जितने आज लोग मशीनी युग में हैं। बिना मशीनों के वहां के बने आभूषणों की कारीगरी देखकर इसका अंदाजा लगाया जा सकता है। धातु ढालने की वहां की तकनीक कमाल की रही है।
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गेयटी के टेवरन हाल में लगी प्रदर्शनी में रखे प्राचीन आभूषणों और औजारों को देखकर इसका अंदाजा लगाया जा सकता है। भाषा एवं संस्कृति विभाग और राष्ट्रीय पांडुलिपि संरक्षण केंद्र शिमला के सौजन्य आयोजित विश्व धरोहर सप्ताह के तहत चौथ दिन प्रदर्शनी में हिमाचल के स्मारकों और सांस्कृतिक स्थलों का विवरण प्रदर्शित किया गया।
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प्रदर्शनी में राज्य संग्रहालय के सौजन्य से किन्नौर और लाहौल स्पीति जिला में किए पुरातात्विक अन्वेषण को दर्शाया है। प्रदर्शनी में रखे आभूषण लोगों के आकर्षण का केंद्र बने रहे। इस क्षेत्र में मिले मनके और आभूषणों से जाहिर है कि धातु ढालने की तकनीक यहां अति उत्कृष्ट रही है। सीपियों का आभूषणों और अन्य प्रसाधनों में उपयोग दर्शाता है कि इस क्षेत्र का समुद्री क्षेत्र के साथ व्यापारिक संबंध रहा है।
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प्रदर्शनी के संयोजक एवं पंजीकरण अधिकारी डाक्टर हरि चौहान ने बताया कि टेवरन हाल में लगाई प्रदर्शनी में अति दुर्लभ तथा पुरातात्विक अवशेषों को प्रदर्शित किया है। यह पहली बार हुआ है जब किसी पुरातात्विक अवशेषों को यहां पर रखा गया है।