जज्बे को सलाम, बसों को धोकर, बच्चों और सास को पाल रहीं मीरा देवी
खबरें लगातार पढ़ने के लिए अमर उजाला एप डाउनलोड करें
या
वेबसाइट पर पढ़ना जारी रखने के लिए वीडियो विज्ञापन देखें
अगर आपके पास प्रीमियम मेंबरशिप है तो
हिमाचल प्रदेश के सिरमौर जिले के ददाहू उपमंडल की मीरा ने महिला सशक्तिकरण की मिसाल कायम की है। पति की मौत के बाद मीरा ने न केवल पिता बनकर बच्चों की जिम्मेदारी निभाई, बल्कि सास के लिए बेटा बनकर हर फर्ज निभा रही हैं।
12वीं कक्षा तक शिक्षित होने के बावजूद पनार गांव की मीरा रोजाना सात से 10 एचआरटीसी और निजी बसें धोकर 150 से 200 रुपये दिहाड़ी कमाकर परिवार का पालन-पोषण कर रही हैं। मीरा के पति सुरेंद्र कुमार का अप्रैल 2015 में दिल का दौरा पड़ने से निधन हो गया था। इसके बाद परिवार के पालन-पोषण के लिए मीरा देवी ने वही कार्य चुना, जो उनके पति किया करते थे।
ददाहू बस स्टैंड में सरकारी बसें धोने के बदले मीरा को 22 रुपये प्रति बस धुलाई के मिलते हैं। वे हर रोज 5 से 7 बसें धोकर बच्चों के सपने साकार कर रही हैं। उनके पति निगम की बसों में वाशिंग मैन के पद पर कार्यरत थे। वहीं, पति की मौत के बाद परिवहन निगम ने मीरा देवी को नौकरी तो नहीं दी, लेकिन उसकी जगह प्रति बस 22 रुपये की दर से बसें धोने का कार्य दे दिया।
कड़ाके की ठंड हो या प्रचंड गर्मी, रोजाना सुबह बसें धोना उनकी दिनचर्या बन गया है। मीरा अपने तीन बच्चों और सास के साथ पनार में ही रह रही हैं। जमा दो तक की शिक्षित होने के बावजूद वे बसों को धोने से नहीं हिचकिचाती हैं।
स्कूल के बाद स्वयं पढ़ाती हैं बच्चों को
मीरा देवी ने बताया कि उनके तीन बच्चे हैं। बड़ा बेटा सातवीं, एक बेटी चौथी में पढ़ाई कर रही है, जबकि एक बेटी एलकेजी में पढ़ती है। बच्चों के पालन-पोषण का खर्चा बसों को धोकर निकलता है। कहती हैं कि कभी 150 तो कभी 200 रुपये दिहाड़ी बन जाती है।
बीपीएल में रखा, पर नहीं मिला कोई लाभ
पनार पंचायत ने मीरा देवी को बीपीएल परिवार की श्रेणी में रखा है, लेकिन अभी तक किसी तरह की वित्तीय सुविधा या योजनाओं का लाभ नहीं मिला है। वे बच्चों के भविष्य को लेकर चिंतित भी हैं।