मिसाल! जुराबें बुनकर पाल रहीं 22 बेसहारा बच्चों को
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सड़क पर अनाथ बच्चे को भीख मांगते देख उनके लिए कुछ करने की ठानने वाली मनाली की सुदर्शना देवी समाज के लिए उम्मीद की मशाल बनी हुई हैं। वे आज 22 अनाथ बच्चों का न सिर्फ पेट पाल रही हैं बल्कि उन्हें अच्छी तालीम भी दिलवा रही हैं। सुदर्शना ने अपने घर को बच्चों के आश्रम में तब्दील कर दिया है। वे खुद और इलाके की अन्य महिलाओं के सहयोग से जुराबें बुनती हैं और उन्हें बेचकर बच्चों का पालन-पोषण कर रही हैं।
सुदर्शना के जीवन में एक समय ऐसा भी आया कि बच्चों को खिलाने के लिए उसके पास फूटी कौड़ी भी नहीं बची। रातभर जुराबें बुनकर सुबह सड़क पर बेचती थीं। उससे मिले पैसों से रोज खाना बनता था। बच्चों की तीन वक्त की रोटी के लिए सुदर्शना ने अपने गहने तक बेच दिए। सुदर्शना सब्जी मंडी में फेंके गोभी के पत्ते उठाकर बच्चों का जैसे-तैसे पेट भरती थीं, लेकिन मुफलिसी के बावजूद किसी के आगे हाथ नहीं फैलाए।
सरकार ने मदद करने के बजाय बढ़ाईं मुश्किलें
न ही बच्चों को कभी भूखा सोने दिया। सरकार और प्रशासन ने उसकी मदद करने के बजाय उलटा मुश्किलें बढ़ाईं। अनाथ बच्चों को पालने वाले घर को जिला प्रशासन ने अनाथ आश्रम माना और पंजीकरण न होने पर बच्चों को उठाकर ले गया। जिला प्रशासन बच्चों को सरकारी अनाथ आश्रम ले गया लेकिन, बच्चे फिर सुदर्शना के पास लौट आए। बकौल सुदर्शना वे बच्चों में सेना में जाने से लेकर रैंप में उतरने का जज्बा भर रही हैं। कई बच्चे पढ़ाई में भी अच्छे हैं।
वर्ष 2004 से इस जुनून में जुटी सुदर्शना आज 22 बच्चों को बेहतर जिंदगी देने में जुटी है। 52 साल की सुदर्शना का कहना है कि समाज सेवा का जज्बा उसे परिवार से ही मिला है। उन्हें याद है कि एक बार पिता ने मां को 250 रुपये जेवर खरीदने को दिए, तो मां जेवरात के बजाय पाइप खरीद लाईं। अपने गांव थरमाहण तक पानी पहुंचाया। सुदर्शना के भाई ने युवाओं को साथ लेकर गांव तक सड़क का निर्माण किया।