बीमा कंपनी को देनी होगी बस हादसे की मुआवजा राशि
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प्रदेश हाईकोर्ट के आदेशानुसार कुफरी के नजदीक लम्बीधार में 4 नवंबर 2008 को हुए बस हादसे में मारे गये लोगों के आश्रितों और घायलों को मुआवजा राशि न्यू इंडिया इंश्योरेंस कंपनी को ही देनी होगी। मुख्य न्यायाधीश मंसूर अहमद मीर ने बीमा कंपनी की 36 अपीलों को खारिज करते हुए यह फैसला सुनाया।
न्यायाधीश मीर ने मोटर एक्सीडेंट क्लेम ट्रिब्यूनल रामपुर के उन दो फैसलों को गलत ठहराते हुए खारिज कर दिया, जिसके तहत हर्जाना राशि देने की जिम्मेवारी बस मालिक पर डाली गई थी। इसी एक्सीडेंट में मारे गये लोगों के आश्रितों के दावों का निपटारा करते हुए मोटर एक्सीडेंट क्लेम ट्रिब्यूनल शिमला ने 36 फैसलों में मुआवजे की जिम्मेवारी बीमा कंपनी पर डाली थी जिन्हें कंपनी ने हाईकोर्ट में चुनौती दी थी।
मामले के अनुसार कुफरी के नजदीक लम्बीधार में 4 नवंबर 2008 की सुबह एक निजी बस दुर्घटनाग्रस्त को गई थी, जिसमें 46 लोग मारे गये थे और कुछ लोग घायल भी हुए थे। बस ड्राइवर की भी मौके पर ही मौत हो गई थी। दुर्घटना से पीड़ित लोगों ने मुआवजा राशि के लिए रामपुर और शिमला के मोटर एक्सीडेंट क्लेम ट्रिब्यूनल में दावे पेश किए।
बीमा कंपनी ने कर दिया था इनकार
बीमा कंपनी ने सभी दावों में बस ड्राइवर जोगिंद्र शर्मा के लाइसेंस को फर्जी बताते हुए और बस को बिना रूट परमिट के चलाने की दलील देते हुए मुआवजे से पल्ला झाड़ना की कोशिश की और रामपुर के ट्रिब्यूनल में सफल रही। कंपनी का दावा था की ड्राइवर के पास हैवी गाड़ी चलाने का लाइसेंस नहीं था और जो लाइसेंस आगरा से जारी होना बताया गया, वह फर्जी था।
रूट परमिट 2 अक्तूबर 2008 को खत्म हो गया था और गाड़ी दुर्घटना वाले दिन बिना रूट परमिट के दौड़ रही थी। शिमला के ट्रिब्यूनल ने बीमा कंपनी से कोई सहमति नहीं जताई। मामला हाईकोर्ट पहुंचने पर न्यायाधीश मीर ने स्पष्ट किया कि दुर्घटना के पीड़ितों को मुआवजा राशि का प्रावधान इसलिए किया गया है।
ताकि उन्हें आकस्मिक पहुंचे इंसानी नुकसान के कारण समाज के आगे गुजर बसर के लिए हाथ न फैलाने पड़े। पीड़ितों के दावों को महज तकनीकी और कानूनी पेचीदगियों के आधार पर खारिज नहीं कर देना चाहिए। कोर्ट ने यह भी स्पष्ट किया कि ट्रिब्यूनल और हाईकोर्ट को ऐसे मामलों में कानूनी प्रक्रियाओं के मकड़जाल में नहीं फंसना चाहिए।
आठ सप्ताह के भीतर कोर्ट में जमा करानी होगी राशि
इन मामलों में ड्राइविंग लाइसेंस को फर्जी बताने वाली दलील को दरकिनार करते हुए कोर्ट ने कहा कि आगरा से जारी लाइसेंस का रिकार्ड मौजूद न होने का मतलब यह नहीं लगाया जा सकता कि लाइसेंस फर्जी था। इतना ही नहीं जब गाड़ी के मालिक ने लाइसेंस को देखने परखने के बाद ही उसे बतौर ड्राइवर नियुक्त किया था तो गाड़ी मालिक से यह अपेक्षा नहीं की जा सकती की वह लाइसेंस की वैद्यता लाइसेंसिंग अथारिटी के कार्यालय में जाकर चेक करे।
रही रूट परमिट की बात तो इसे पिछली तारीख से जारी करवा लिया गया था। इसलिए कानूनन बस वैध रूट परमिट के तहत चल रही थी। कोर्ट ने एक साथ सभी अपीलों का निपटारा करते हुए कुछ मामलों में मुआवजा राशि में भी इजाफा किया और बीमा कंपनी को मुआवजा राशि 8 सप्ताह के भीतर कोर्ट में जमा करने के आदेश दिए, जिसके बाद यह राशि दावेदारों को दे दी जाएगी।