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Shimla News: चेक बाउंस मामले में दोषी की कैद की सजा बरकरार
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ट्रायल कोर्ट का फैसला किया संशोधित
जुर्माना राशि को 63.29 लाख से घटाकर 16.96 लाख किया
संवाद न्यूज एजेंसी
शिमला। सत्र न्यायालय ने चेक बाउंस के एक मामले में ट्रायल कोर्ट (निचली अदालत) के निर्णय को संशोधित किया है।
अतिरिक्त सत्र न्यायाधीश प्रवीण गर्ग की अदालत ने दोषी विकेश देष्टा पर लगाए 63,29,246 रुपये के जुर्माना को घटाकर 16,96,355 रुपये किया है। इसके साथ निचली अदालत के 3 नवंबर 2022 को दिए डेढ़ साल की कैद की सजा को बरकरार रखने के आदेश दिए हैं। साथ ही अदालत ने सुनवाई में दोषी को तत्काल निचली अदालत के समक्ष आत्मसमर्पण करने के निर्देश दिए हैं। यह मामला साल 2010 में भारतीय स्टेट बैंक, सचिवालय, छोटा शिमला शाखा का है। उपमंडल रोहड़ू निवासी दोषी विकेश देष्टा ने अंतर्निहित भूमि के साथ तीन मंजिला निर्मित संरचना की खरीद के लिए शिकायतकर्ता बैंक से 28,68,200 की आवास ऋण लिया था।
आश्वासन दिया कि इस राशि को 300 समान किस्तों में चुका देगा। दोषी दायित्व को पूरा करने में विफल रहा। 16 मई 2017 को उसके ऋण खाते को गैर-निष्पादित परिसंपत्ति (एनपीए) के रूप में वर्गीकृत किया गया। एक जुलाई 2017 तक बकाया ऋण शेष 30,53,645 था। खाता एनपीए हो जाने पर ब्याज अर्जित होना बंद हो गया। दोषी ने बैंक के पक्ष में 31,64,623 रुपये का चेक जारी किया लेकिन बाउंस हो गया। इसके बाद अगस्त 2022 को ट्रायल कोर्ट के समक्ष शिकायत दर्ज की थी। अतिरिक्त सत्र न्यायाधीश अदालत ने आदेश दिए हैं कि दोषी तत्काल आत्मसमर्पण नहीं करता है, तो निचली अदालत पारित आदेश को निष्पादित करने के लिए स्वतंत्र है।
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जुर्माना राशि को 63.29 लाख से घटाकर 16.96 लाख किया
संवाद न्यूज एजेंसी
शिमला। सत्र न्यायालय ने चेक बाउंस के एक मामले में ट्रायल कोर्ट (निचली अदालत) के निर्णय को संशोधित किया है।
अतिरिक्त सत्र न्यायाधीश प्रवीण गर्ग की अदालत ने दोषी विकेश देष्टा पर लगाए 63,29,246 रुपये के जुर्माना को घटाकर 16,96,355 रुपये किया है। इसके साथ निचली अदालत के 3 नवंबर 2022 को दिए डेढ़ साल की कैद की सजा को बरकरार रखने के आदेश दिए हैं। साथ ही अदालत ने सुनवाई में दोषी को तत्काल निचली अदालत के समक्ष आत्मसमर्पण करने के निर्देश दिए हैं। यह मामला साल 2010 में भारतीय स्टेट बैंक, सचिवालय, छोटा शिमला शाखा का है। उपमंडल रोहड़ू निवासी दोषी विकेश देष्टा ने अंतर्निहित भूमि के साथ तीन मंजिला निर्मित संरचना की खरीद के लिए शिकायतकर्ता बैंक से 28,68,200 की आवास ऋण लिया था।
आश्वासन दिया कि इस राशि को 300 समान किस्तों में चुका देगा। दोषी दायित्व को पूरा करने में विफल रहा। 16 मई 2017 को उसके ऋण खाते को गैर-निष्पादित परिसंपत्ति (एनपीए) के रूप में वर्गीकृत किया गया। एक जुलाई 2017 तक बकाया ऋण शेष 30,53,645 था। खाता एनपीए हो जाने पर ब्याज अर्जित होना बंद हो गया। दोषी ने बैंक के पक्ष में 31,64,623 रुपये का चेक जारी किया लेकिन बाउंस हो गया। इसके बाद अगस्त 2022 को ट्रायल कोर्ट के समक्ष शिकायत दर्ज की थी। अतिरिक्त सत्र न्यायाधीश अदालत ने आदेश दिए हैं कि दोषी तत्काल आत्मसमर्पण नहीं करता है, तो निचली अदालत पारित आदेश को निष्पादित करने के लिए स्वतंत्र है।
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