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शोध: आईआईटी मंडी के शोधार्थियों ने किया अध्ययन, ऊंचाई वाले क्षेत्रों का सूखे से गहरा संबंध
Wed, 14 Jun 2023 12:32 PM IST
अरविन्द ठाकुर
संवाद न्यूज एजेंसी, मंडी
संवाद न्यूज एजेंसी, मंडी
Published by: अरविन्द ठाकुर
Updated Wed, 14 Jun 2023 12:32 PM IST
सार
आईआईटी मंडी के डॉ. दीपक स्वामी ने कहा कि शोध टीम ने सूखे के पैटर्न का अध्ययन करने के लिए (1979-2020) तक 42 वर्षों की मासिक वर्षा और अधिकतम और न्यूनतम तापमान के व्यापक डाटा का उपयोग करने के लिए सांख्यिकीय तकनीकों का इस्तेमाल किया है।
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आईआईटी मंडी के शोधकर्ता।
- फोटो : संवाद
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विस्तार
भारतीय प्रौद्योगिकी संस्थान मंडी के शोधकर्ताओं ने ऊंचाई और सूखे के बीच के संबंधों का पता लगाया है। सामने आया है कि ऊंचाई वाले क्षेत्रों में सूखे की घटनाएं अधिक हो रही हैं। आईआईटी मंडी के शोधकर्ताओं ने सिंधु नदी के प्रवाह क्षेत्र में सूखे की घटना और ऊंचाई से इसमें बदलाव के बीच संबंध का पता लगाने के लिए मौसम संबंधी मापदंडों का उपयोग किया। साबित हुआ है कि ऊंचाई और सूखे के बीच मजबूत संबंध है।
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जहां निचले क्षेत्रों में वर्षा के रुझानों को देखा जा रहा है, वहीं ऊंचाई वाली भूमि पर सूखे की घटनाएं हो रहीं हैं। इस रिसर्च के निष्कर्षों को जर्नल एटमॉस्फेरिक रिसर्च में विभिन्न शोधार्थियों के सहयोग से प्रकाशित किया गया है। जनसंख्या में लगातार वृद्धि के साथ ही पानी की मांग में भी लगातार वृद्धि हो रही है। इसकी उपलब्धता सीमित है। इसके साथ ही वैश्विक जलवायु परिवर्तन और बाढ़ और सूखे जैसे अत्यधिक जल संबंधित घटनाओं के कारण मानव समाज को खतरा पैदा हो रहा है।
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आईआईटी मंडी के डॉ. दीपक स्वामी ने कहा कि शोध टीम ने सूखे के पैटर्न का अध्ययन करने के लिए (1979-2020) तक 42 वर्षों की मासिक वर्षा और अधिकतम और न्यूनतम तापमान के व्यापक डाटा का उपयोग करने के लिए सांख्यिकीय तकनीकों का इस्तेमाल किया है। सूखे की मात्रा का निर्धारण जलवायु जल संतुलन पर आधारित सूखे के संकेतक का उपयोग करके किया गया था जो सूखे को समझने के लिए महत्वपूर्ण होता है।
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2,000 और 6,000 मीटर के बीच की ऊंचाई में दिखी शुष्क स्थिति
शोध के बारे में बात करते हुए आईआईटी मंडी के डॉ. विवेक गुप्ता ने कहा कि 2,000 मीटर से नीचे के क्षेत्रों में नमी की स्थिति देखी गई, जबकि 2,000 और 6,000 मीटर के बीच की ऊंचाई में शुष्क स्थिति देखी गई। हालांकि 4,000 मीटर से ऊपर की ऊंचाई पर सूखे की दर धीमी थी। इसके अलावा शोध के निष्कर्षों ने अलग-अलग मौसमों में सूखे की स्थितियों में महत्वपूर्ण विविधता पर प्रकाश डाला है। मानसून और मानसून के बाद के मौसम में अधिकतर क्षेत्रों में नमी की स्थितियां देखी गईं जबकि प्री-मानसून मौसम में सूखे की स्थितियों वाले अधिक क्षेत्र देखे गए। अध्ययन क्षेत्र में अत्यधिक सूखे की स्थितियां 1979-2020 तक शून्य प्रतिशत से पांच प्रतिशत तक विस्तारित हुईं हैं।
इन्होंने किया है शोध
इस शोध में डॉ. दीपक स्वामी एसोसिएट प्रोफेसर, स्कूल ऑफ सिविल एंड इंनवायरमेंटल इंजीनियरिंग आईआईटी मंडी, डॉ. विवेक गुप्ता, असिस्टेंट प्रोफेसर, स्कूल ऑफ सिविल एंड इंनवायरमेंटल इंजीनियरिंग आईआईटी मंडी और आईआईटी जम्मू के सिविल इंजीनियरिंग विभाग के डॉ. नितिन जोशी के साथ आईआईटी मंडी के पीएचडी स्कॉलर अमित दुबे के शामिल हैं।
भारत के लिए विशेष महत्व रखता है शोध: यह दृष्टिकोण भारत के लिए विशेष महत्व रखता हैं क्योंकि वर्षा आधारित कृषि का प्रचलन सिंधु नदी प्रवाह क्षेत्र के ऊंचे इलाकों में ज्यादा है। इस क्षेत्र का भूगोल जल भंडारण और उचित सिंचाई बुनियादी ढांचे को सीमित करता है। इससे यह क्षेत्र पानी की कमी के प्रति संवेदनशील हो जाता है और शुष्क अवधि के दौरान यहां फसल की पैदावार कम हो जाती है। सूखे के नकारात्मक प्रभावों को कम करने के लिए और प्रभावी नीति निर्माण के लिए मौसम संबंधी घटकों पर ऊंचाई के प्रभाव को समझना महत्वपूर्ण है।