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Himachal: हिमकेयर में बजट न होने का बहाना बनाकर नहीं रोक सकते इलाज का पैसा, जानें हाईकोर्ट के बड़े आदेश

Tue, 07 Jul 2026 05:10 AM IST
Krishan Singh संवाद न्यूज एजेंसी, शिमला।
संवाद न्यूज एजेंसी, शिमला। Published by: Krishan Singh Updated Tue, 07 Jul 2026 05:10 AM IST
सार

प्रदेश हाईकोर्ट ने हिमकेयर योजना के तहत इलाज पर हुए खर्च का भुगतान नहीं करने पर कड़ा रुख अपनाया है। जानें हिमाचल हाईकोर्ट के बड़े आदेश। 

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hp High Court major orders: Funds for treatment under Himcare cannot be withheld citing a budget crunch
हिमाचल प्रदेश हाईकोर्ट। - फोटो : अमर उजाला

विस्तार

हिमाचल प्रदेश हाईकोर्ट ने हिमकेयर योजना के तहत इलाज पर हुए खर्च का भुगतान नहीं करने पर कड़ा रुख अपनाया है। अदालत ने राज्य सरकार को आदेश दिया कि वह मंगलवार तक याचिकाकर्ता के हक की राशि जारी करने का हर संभव प्रयास करे। अदालत ने स्पष्ट किया कि जब सरकार योजना के तहत प्रतिबद्ध है और खुद विभाग ने भी मरीज के दावे को सही मान लिया है, तो केवल फंड उपलब्ध नहीं होने के आधार पर इसे रोका नहीं जा सकता। इस मामले में अगली सुनवाई अब 7 जुलाई को होगी। याचिकाकर्ता सुरेंद्र कुमार हिमकेयर योजना के लाभार्थी हैं। उन्हें दिल की बीमारी के चलते पीजीआई चंडीगढ़ में भर्ती होना पड़ा था। वहां उनके दिल में कोरोनरी स्टेंट डाले गए थे।

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इस इलाज के दौरान उनका कुल खर्च 2.70 लाख रुपये आया था। हिमकेयर कार्ड धारक होने के नाते उन्हें पूरी तरह मुफ्त इलाज मिलना चाहिए था, लेकिन राज्य सरकार की ओर से अस्पताल को समय पर भुगतान न किए जाने के कारण उन्हें इस राशि का भुगतान खुद करना पड़ा। बार-बार आग्रह किए जाने के बाद जब राशि का भुगतान न हुआ तो 12 दिसंबर 2025 को उन्होंने एचपी स्वास्थ्य बीमा योजना सोसायटी के मुख्य कार्यकारी अधिकारी को कानूनी नोटिस भेजा। विभाग ने 2 फरवरी 2026 को अपने जवाब में स्वीकार किया कि मरीज की 2.70 लाख की क्लेम राशि पूरी तरह वैध है। साथ ही विभाग ने राशि रोकने का कारण हिमकेयर योजना के तहत फंड की अनुपलब्धता बताया था।

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अवमानना याचिका पर स्वास्थ्य विभाग की प्रधान सचिव समेत अन्य को कारण बताओ नोटिस

प्रदेश हाईकोर्ट ने अवमानना याचिका पर कड़ा रुख अपनाया है। अदालत ने स्वास्थ्य विभाग की प्रधान सचिव एम सुधा देवी के अलावा चिकित्सा शिक्षा निदेशक राकेश शर्मा और स्वास्थ्य सेवा निदेशक गोपाल बेरी को कारण बताओ नोटिस जारी किया है। यह नोटिस शहीद दीवान चंद कटोच एजुकेशन सोसायटी की याचिका पर दिया गया है। हाईकोर्ट ने पूछा है कि अदालती आदेशों की अवहेलना के लिए क्यों न उन पर अवमानना कार्रवाई की जाए। अदालत ने यह भी पूछा कि उन्हें क्यों न दंडित किया जाए। याचिकाकर्ता का आरोप है कि अधिकारियों ने हाईकोर्ट के निर्देशों का जानबूझकर उल्लंघन किया है। यह मामला नर्सिंग संस्थान खोलने के लिए अनिवार्यता अनापत्ति प्रमाण पत्र (एनओसी) जारी करने से संबंधित है। हाईकोर्ट ने 24 नवंबर 2025 को मुख्य याचिका का निपटारा किया था। इसमें संबंधित अधिकारियों को तीन सप्ताह के भीतर एनओसी पर अंतिम निर्णय लेने का निर्देश दिया गया था। हालांकि, महीनों बीतने के बाद भी अधिकारियों ने इस पर कोई कार्रवाई नहीं की है। विभाग की ओर से हाईकोर्ट के आदेशों पर अभी तक कोई अमल नहीं हुआ है। मामले की अगली सुनवाई 13 जुलाई को होगी।

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सेवा विस्तार मामले में अनुपालन हलफनामा दायर, पूर्व मुख्य सचिव को व्यक्तिगत पेशी से छूट

प्रदेश में सेवानिवृत्त कर्मचारियों को सेवा विस्तार देने से जुड़े मामले में राज्य सरकार ने हाईकोर्ट के आदेशों का पालन करते हुए अनुपालन हलफनामा रिकॉर्ड पर रख दिया है। न्यायाधीश विरेंद्र सिंह की एकल पीठ ने इस हलफनामे को रिकॉर्ड पर लेते हुए मामले की अगली सुनवाई 22 जुलाई तय की है। सुनवाई करते हुए अदालत ने कहा कि आगामी आदेशों तक राज्य सरकार के पूर्व मुख्य सचिव प्रबोध सक्सेना को अगली सुनवाई पर व्यक्तिगत रूप से पेश होने से छूट दी है। यह मामला 2017 में जनहित याचिका में दिए गए कोर्ट के उस फैसले से जुड़ा है, जिसमें साफ कहा गया था कि हैंडबुक ऑन पर्सनल मैटर्स और फंडामेंटल रूल्स 56 (डी) के विशेष प्रावधानों को छोड़कर किसी भी कर्मचारी को सेवानिवृत्ति की आयु के बाद सेवा विस्तार नहीं दिया जाएगा।

आरोप लगाया गया है कि सरकार ने इन नियमों को ताक पर रखकर कई सेवानिवृत्त कर्मचारियों को धड़ल्ले से सेवा विस्तार दिया है, जो सीधे तौर पर अदालत की अवमानना है। इसके बाद अदालत ने प्रदेश सरकार को एक हलफनामा दायर करने के आदेश दिए। इस हलफनामे में 19 दिसंबर 2017 से लेकर अब तक (2026 तक) जितने भी सेवानिवृत्त कर्मचारियों को सेवा विस्तार या पुनर्रोजगार दिया गया है, उन सभी की पूरी सूची और विस्तृत ब्योरा कोर्ट के समक्ष रखने को कहा था। अदालत ने सेवानिवृत्त कर्मचारियों को सेवा विस्तार या पुनर्रोजगार देने के मामले पर कड़ा रुख अपनाया है। अदालत ने इसे वर्ष 2017 में जारी किए गए अपने ही आदेशों का उल्लंघन माना है।
 

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