नरेश भारद्वाज ने सूबे से बाहर भी दी हिमाचल की संस्कृति को पहचान
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नरेश ने प्रदेश में ही नहीं, बल्कि उत्तराखंड, पंजाब, हरियाणा, दिल्ली आदि राज्यों में भी अपनी गायकी का हुनर दिखाया है। हिमाचल प्रदेश की हॉरर फिल्म ‘मशाण’ में भी अपनी आवाज दी है।
आजकल के चकाचौंध के जमाने में जहां गायक आधुनिक परिधान पहनकर प्रस्तुतियां देते हैं, वहीं नरेश भारद्वाज पहाड़ी संस्कृति के रीति-रिवाज और वेशभूषा को तवज्जो देते हैं। इनकी पहली ऑडियो कैसेट 2000 में ‘तेरी निगाहें’ आई थी, जिससे उन्हें काफी ख्याति मिली।
इसमें चांदी रा छल्ला, नीलिए बोलूं नदिए, खड़ी कवाली, लाए छतरे नीले, जुटू रे झलारे, दिल संग ला ना गोरिए, वो दिल तोड़ गई, तुम्हें चले हामा छाड़ियो, खिमेराम की नाटी, नारा री कलुए लोकगीतों आदि में अपनी आवाज दी है।
लोक गायकी को सिर्फ पैसा कमाने का ही जरिया न बनाएं
नरेश भारद्वाज के पिता का नाम हीराराम है, जो पुलिस विभाग में कार्यरत थे। माता जमुना देवी गृहिणी हैं। वह पिछले 18 वर्षों से गायन के क्षेत्र में हैं और इनके गीत अक्सर आकाशवाणी से भी सुनने को मिलते रहे हैं।
दूरदर्शन से भी इनके लोकगीतों को चलाया जाता रहा है। भारद्वाज ने 5 वर्षों तक लोकसंपर्क विभाग शिमला में भी एक कैजुअल कलाकार के रूप में काम किया है। हिमाचल के सभी अंतरराष्ट्रीय मेले में वह अपने कार्यक्रम दे चुके हैं।
नरेश भारद्वाज को 2009 सिरमौर कला संगम की ओर से कला साधक सम्मान से सम्मानित किया गया। भारद्वाज ने नए गायकों को प्रेरणा देते हुए कहा कि नए कलाकार हमेशा अपनी संस्कृति को ध्यान में रखें। खासकर बड़े मंचों पर अपनी संस्कृति को हमेशा तव्वजो दें।
लोक गायकी को सिर्फ पैसा कमाने का ही जरिया न बनाएं, इसका सम्मान भी करें। उन्होंने कहा है कि हिमाचली कलाकारों को आजकल के समय में काफी तवज्जो दी जा रही है, इससे रोजगार के साधन भी बढ़ रहे हैं।