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जरूर पढ़ें, हिमाचल हाइकोर्ट का ये अहम फैसला

Tue, 23 Dec 2014 10:29 AM IST
Updated Tue, 23 Dec 2014 10:29 AM IST
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Himachal pradesh high court shimla

हिमाचल प्रदेश हाई कोर्ट ने राज्य सरकार को आदेश दिए हैं कि आगामी 26 जनवरी से पुलिस थानों में दर्ज होने वाली प्रत्येक प्राथमिकी को सार्वजनिक किया जाए। न्यायाधीश तरलोक चौहान ने अपने आदेशों में स्पष्ट किया है कि 26 जनवरी के बाद दर्ज होने वाली हर प्राथमिकी को ऑफि शियल वेबसाइट पर अपलोड किया जाए, जिससे जरूरतमंद लोग इसे वेबसाइट से डाउनलोड कर सके।

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उक्त आदेशों की अनुपालना के लिए अदालत ने हिमाचल प्रदेश के मुख्य सचिव को जिम्मेवारी सौंपी है और 30 जनवरी तक अनुपालना रिपोर्ट तलब की है। अदालत ने उक्त आदेश प्रार्थी रामानंद राठौड़ की याचिका की सुनवाई के दौरान पारित किए। प्रार्थी के खिलाफ एसपी शिमला की ओर से पुलिस स्टेशन छोटा शिमला में भारतीय दंड संहिता की धारा 447 और 341 के तहत मामला दर्ज है। पुलिस के डर के कारण प्रार्थी पुलिस स्टेशन नहीं जा पा रहा है और उसे एफआरआई की कॉपी नहीं मिल रही।
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अक्षम बच्चों को सुविधाएं न देने पर जवाब तलब

Himachal pradesh high court shimla

प्रदेश के शिक्षण संस्थानों में अक्षम छात्रों के लिए मूलभूत सुविधाएं मुहैया न करवाने के मामले में हाई कोर्ट ने राज्य सरकार से एक सप्ताह के भीतर जवाब तलब किया है। दृष्टिहीन छात्र की ओर से मुख्य न्यायाधीश के नाम लिखे पत्र पर हाई कोर्ट ने संज्ञान लेते हुए उक्त आदेश पारित किए।

प्रार्थी ने आरोप लगाया है कि प्रदेश के किसी भी संस्थान में प्रार्थी जैसे छात्रों की पढ़ाई के बारे में जरूरी सुविधाएं नहीं हैं। इससे उनकी पढ़ाई पर विपरीत असर पड़ता है। पत्र में कहा गया है कि सर्वोच्च न्यायालय के दिशा निर्देशों के अनुसार राज्य सरकार का दायित्व है कि वे अपंगों और अक्षम छात्रों के लिए अच्छा माहौल मुहैया करवाए।

हाईकोर्ट ने एकल पीठ का फैसला किया निरस्त

Himachal pradesh high court shimla

हिमाचल हाई कोर्ट ने स्पष्ट किया है कि कोई भी नियोक्ता अपने कर्मचारियों को मौलिक अधिकारों के विपरीत सहमति देने के लिए बाध्य नहीं कर सकता। मुख्य न्यायाधीश मंसूर अहमद मीर और न्यायाधीश तरलोक सिंह चौहान की खंडपीठ ने एकलपीठ के निर्णय को रद्द कर दिया जिसके तहत राज्य सरकार के लिए गए निर्णय को सही ठहराया गया था। प्रार्थी जोकि शिक्षा विभाग में लेक्चरर के पद पर अनुबंध आधार 43000 रुपये मासिक वेतनमान पर लगाया गया था।

लेकिन सरकार ने उसे 43000 देने के बजाय 21000 रुपये वेतन ही अदा किया। एकलपीठ के समक्ष सरकार ने दलील दी थी कि प्रार्थी ने 43000 लेने के बजाय 21000 रुपये वेतन पर ही अपनी सहमति जताई थी। एकलपीठ ने राज्य सरकार के लिए गए निर्णय पर अपनी मुहर लगा दी थी जिसे खंडपीठ ने रद्द करते हुए राज्य सरकार को आदेश दिए कि वह प्रार्थी को 43000 रुपये मासिक वेतनमान दे।

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