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हिमाचल में कई जगह है दुनिया के सबसे लंबे पक्षियों का बसेरा
Mon, 30 Nov 2020 10:55 AM IST
अरविन्द ठाकुर
पंकज चब्बा, अमर उजाला नेटवर्क, संतोषगढ़ (ऊना)
पंकज चब्बा, अमर उजाला नेटवर्क, संतोषगढ़ (ऊना)
Published by: अरविन्द ठाकुर
Updated Mon, 30 Nov 2020 10:55 AM IST
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- फोटो : अमर उजाला
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सारस क्रेन भारतीय उपमहाद्वीप, दक्षिणपूर्व एशिया और ऑस्ट्रेलिया के कुछ हिस्सों में पाया जाने वाला एक बड़ा गैर प्रवासी क्रेन है। सारस पक्षी एक खूबसूरत और बड़ा पक्षी है। यह पूरी दुनिया के तालाबों, नदियों, झीलों व तराई वाले क्षेत्रों के पास पाया जाता है। यह पक्षी हमेशा जोड़ा बनाकर रहता है। एक बार जोड़ा टूटने पर यह वापस कभी भी जोड़ा नहीं बनाता है। दुनिया भर में उड़ने वाले पक्षियों में सबसे बड़ा पक्षी है।
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इसकी लंबाई 1.8 मीटर (5.9 फीट) है। इसका पंख 2.4 मीटर (8 फीट) और इसका वजन 8.4 किलो (18.5 पाउंड) तक हो सकता है। यह खुले गीले मैदान पर रहना पसंद करते हैं। वे अपने समग्र ग्रे रंग और विपरीत लाल सिर और ऊपरी गर्दन की वजह से दूसरी क्रेनों से भिन्न होते हैं। प्रदेश के सिरमौर, कांगड़ा व ऊना जिला में सारस क्रेन की मौजूदगी के कई प्रमाण वन्य जीव प्राणी विभाग के पास भी है। हालांकि समय के साथ साथ इन की संख्या कम होती जा रही है।
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जो पर्यावरण व वन्य जीव प्राणी प्रेमियों के लिए चिंता का विषय है। सारस दुनिया में सबसे अधिक भारत में पाए जाते हैं। इसमें देश की कुल संख्या के 60 प्रतिशत सारस उत्तर प्रदेश में पाए जाते हैं। इसी वजह से उत्तर प्रदेश सरकार की ओर से सारस क्रेन को राज्य पक्षी का दर्जा दिया गया है। भारत वर्ष में सारस क्रेन उत्तर प्रदेश, हरियाणा, पंजाब, राजस्थान, गुजरात, बिहार, मध्य प्रदेश, छत्तीसगढ़ तथा उत्तर पूर्वी महाराष्ट्र में पाए जाते हैं।
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भारत वर्ष में क्रेन की छह प्रजातियां पाई जाती हैं, जिसमें सारस सर्वाधिक लोकप्रिय है। सारस पक्षी वर्तमान में विलुप्त तेजी से विलुप्त हो रहे है। दुनिया के कई देशों से यह पूर्णतया खत्म हो चुका है। भारत में भी इनकी संख्या में कमी आई है। इसका मुख्य कारण जलवायु में परिवर्तन और इनका शिकार है। देश में वर्तमान में लगभग 12-15 हजार के करीब ही सारस बचे है। जब कि प्रदेश भर में सारस के मात्र कुछ दर्जन जोड़े ही बचे हैं।
वन्य प्राणी एवं संरक्षण विभाग के डीएफओ राहुल रोहिने ने कहा कि प्रदेश में साईबेरियन सारस सिरमौर कांगड़ा व ऊना जिले के अलावा कुछ एक स्थानों पर हो सकते है। कांगड़ा के पौंग जलाशय में सारस क्रेन का मात्र एक ही जोड़ा देखा गया है। जो कुछ साल पहले ही इस क्षेत्र में आया था। बीते माह इस जोड़े में मादा सारस ने दो अंडे दिए थे। जिनका संरक्षण किया गया है। ऊना में स्वां नदी के तराई वाले क्षेत्र में सारस के लगभग चार-पांच जोड़े रह रहे हैं।
वाइल्ड बर्ड वाचर एवं वन्यजीव प्राणी संरक्षण से जुड़ी जागृति संस्था के अध्यक्ष प्रभात भट्टी का कहना है कि ऊना जिला में स्वां नदी के मुहानों पर दो तीन दशक पूर्व लगभग साईबेरियन सारस के लगभग 18-20 जोड़े रहा करते थे। मगर चिंता का विषय है कि स्वां नदी में अवैध खनन के चलते और प्राकृतिक जलाशयों के सिकुड़ने से सारस इस क्षेत्र से भी विलुप्त होते जा रहे है।