स्मार्ट सिटी से पहले हिमाचल को है स्मार्ट अफसरों की जरूरत
खबरें लगातार पढ़ने के लिए अमर उजाला एप डाउनलोड करें
या
वेबसाइट पर पढ़ना जारी रखने के लिए वीडियो विज्ञापन देखें
अगर आपके पास प्रीमियम मेंबरशिप है तो
स्मार्ट सिटी की अधिसूचना रद्द करते हुए हाईकोर्ट ने हिमाचल के अफसरों पर एकदम सटीक मशविरा दिया। कोर्ट ने कहा अधिकारियों को अपने विवेक का आत्मसमर्पण नहीं करना चाहिए। हमारे शास्त्रों के अनुसार मनुष्य की समग्र चेतना तीन तत्वों के इर्द-गिर्द घूमती है। वे हैं विवेक, बुद्धि और वृत्ति। विवेक से श्रेष्ठतम चलते हैं। बुद्धि से वे जो मध्य में हैं और वृत्ति चेतना की निम्नतम दशा है।
तो इस तरह वृत्ति पाशविक अवस्था है। बुद्धि मानवीय है। विवेक दिव्य है। तो अगर हमारी अदालतें चाहती हैं कि हमारे श्रेष्ठ सेवक दिव्य अवस्था को प्राप्त हों तो इसमें कुछ गलत नहीं। ये ठीक है कि लोकतंत्र में जनप्रतिनिधि या मंत्री सरकार के प्रभारी होते हैं, लेकिन अफसरशाहों से उम्मीद की जाती है कि वे राज्य की नीतियों पर विचार करते वक्त किसी राजनीतिक दृष्टिकोण या अपने मंत्री के किसी राजनीतिक लाभ हानि का समर्थन नहीं करेंगे।
मोदी सरकार ने देश में सौ स्मार्ट शहरों का सपना देखा है। आप कह सकते हैं कि यह एक हवाई जुमला है, क्योंकि भारत में हर शहर का अपना एक अलग कल्चर और एक अलग भौगोलिक पहचान है। कोई शहर समुद्र तल से आठ हजार से अधिक की ऊंचाई पर बसा है तो कोई रेगिस्तान में। कहीं आबादी का दबाव है तो कहीं यातायात का। कई तो शहरी जीवन की स्वास्थ्य, आवास, सीवर, रोजगार जैसी बुनियादी शर्तों को भी पूरा नहीं करते।
अफसरों ने धर्मशाला का किया था चयन
उन्हें वाईफाई और सुपरटेक प्रौद्योगिकी से लैस करना एक सपने से ज्यादा और कुछ नहीं। इन सबसे ज्यादा महत्वपूर्ण है माइंड सेट। सच तो यह है कि हम अभी शहरों में रहने के काबिल नहीं हुए। खैर ये अलग बहस है। हावर्ड के कानूनविद् प्रो. जोराल्ड फ्रूग ने एक पते की बात कही है। वह यह कि शहरों को स्मार्ट होने के लिए जरूरी है उन्हें एक दिमाग दिया जाए जो खुद अपने फैसले ले सकें बजाए इसके कि वे रोबोट की तरह आदेशों का पालन करें।
और ठीक यही हिमाचल में स्मार्ट सिटी के चयन को लेकर हुआ। चयन प्रक्रिया के शुरू से दो महीने पहले ही तय हो गया था कि धर्मशाला स्मार्ट सिटी बनेगी। तर्क भी वाजिब थे कि यहां बौद्ध धर्मगुरु दलाईलामा हैं, जिनसे मिलने पूरी दुनिया से लोग आते हैं। यहां एयरपोर्ट है। थोड़ी दूरी पर रेल की पटरियां हैं। और अब तो एक अंतरराष्ट्रीय खेल स्टेडियम भी बन गया है, जहां कई सालों बाद पाकिस्तान के खिलाफ सबसे रोमांचक मैच होने जा रहा है।
सबसे बड़ी बात यहां शहर के विस्तार की अपार संभावनाएं हैं, जो पहाड़ों से घिरे तंग शिमला में नहीं दिखतीं। आखिरी में सारे आंकड़े और तथ्य जुटाकर अफसरों ने साबित कर दिया कि धर्मशाला अकेला विकल्प है। और स्कूली बच्चों की तरह उसे गैर परीक्षा के सर्वश्रेष्ठ अंक दिए गए।
शिमला की नाराजगी भी जायज
ऐसे में शिमला की नाराजगी जायज थी। शिमला ब्रिटिश हुकूमत की शानदार राजधानी रही, क्या हुआ जो आज कंकरीट के जंगल में तबदील हो गई है। यहां हर साल लाखों पर्यटक आते हैं, क्या हुआ जो उनके लिए आधारभूत सुविधाएं तक नहीं हैं। यहां अंग्रेजों के जमाने का पेयजल का नेटवर्क आज भी काम कर रहा है, क्या हुआ जो यहां बिना मीटर रीडिंग के बिजली का बिल जारी किया जाता है और नलों से पीला पानी आता है।
यहां पहाड़ियों पर लाजवाब सड़कें हैं, क्या हुआ जो आप उन सड़कों पर बिना पास के नहीं चल सकते। यह विकसित होता शहर है, जहां हर दूसरे घर में एक कार है, क्या हुआ उन सभी को सड़क पर अपनी गाड़ी खड़ी करनी पड़ती है और चालान के डर से उन्हें रातों को नींद नहीं आती।इसीलिए अफसरों ने बड़े करीने से शिमला नगर निगम को नाकाबिल और नाकारा घोषित कर दिया।
जेएनएनयूआरएम के तहत जलापूर्ति वितरण प्रणाली, मल निकासी, आशियाना, ई गवर्नेंस योजना के लिए शिमला के पास 147 करोड़ रुपये का बजट आया, लेकिन नगर निगम इनमें से कोई काम नहीं कर सका और केंद्र ने इन योजनाओं को निरस्त कर दिया। लेकिन, सोचने वाली बात यह है कि क्या इसके लिए सिर्फ नगर निगम जिम्मेदार है। क्या अफसरों की जिम्मेदारी नहीं थी कि वे इस पैसे को डूबने से बचाएं।
क्या शिमला की लचर सीवरेज व्यवस्था और बेदम हो चुकी जलापूर्ति प्रणाली से अफसर अनिभिज्ञ हैं। या फिर उनकी सोच ये है कि नगर निगम कामरेडों कस है, वह जहन्नुम में जाएं। योजना में विकास का जो धन डूबा, वह सिर्फ शिमला का नहीं पूरे राज्य का नुकसान है। या फिर धर्मशाला को सिर्फ इसलिए स्मार्ट सिटी बनना चाहिए, क्योंकि उनके मंत्री ऐसा चाहते हैं। क्योंकि वहां उनका वोट बैंक है। या फिर ये राजनीतिक प्रतिद्वंद्विता का जवाब कि तुमने धर्मशाला को स्टेडियम दिया और अब हम उसे स्मार्ट सिटी देते हैं।
तो कोर्ट अफसरों को विवेक से काम करने की सलाह यही समझाने के लिए दे रहा है। सरकारें आएंगी फिर चली भी जाएंगी, लेकिन अफसर कहीं नहीं जाएंगे। वह भीष्म की तरह हस्तिनापुर की कुर्सी से बंधे हैं। उनकी दक्षता और योग्यता ने उन्हें यहां तक पहुंचाया है। राजनीतिक नियंत्रण पर संतुलन बनाए रखने के लिए उनके पास बुद्धि है जिसका वह प्रयोग कर सकते हैं, लेकिन जनहित के कार्यों के लिए उन्हें विवेक का इस्तेमाल करना होगा। वह भी अगर उन्होंने राजनेताओं को समर्पित कर दिया तो क्या बचेगा।