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HP High Court: दुष्कर्म के आरोपी चिकित्सक को हाईकोर्ट से सशर्त अग्रिम जमानत
Sat, 18 Feb 2023 09:03 PM IST
अरविन्द ठाकुर
अमर उजाला ब्यूरो, शिमला
अमर उजाला ब्यूरो, शिमला
Published by: अरविन्द ठाकुर
Updated Sat, 18 Feb 2023 09:03 PM IST
सार
अदालत ने मामले से जुड़े रिकॉर्ड का अवलोकन करने पर पाया कि पीड़ित और याचिकाकर्ता के आपसी संबंध अच्छे थे। शिकायतकर्ता के पास ऐसा कोई ठोस सबूत नहीं है कि याचिकाकर्ता उसे गुमराह करने की कोशिश कर रहा है।
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हिमाचल प्रदेश हाईकोर्ट।
- फोटो : अमर उजाला
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विस्तार
हिमाचल प्रदेश हाईकोर्ट ने दुष्कर्म के आरोपी चिकित्सक को सशर्त जमानत दे दी है। न्यायाधीश सत्येन वैद्य ने याचिकाकर्ता वीरेंद्र सिंह को 50 हजार रुपये के मुचलके पर रिहा करने के आदेश दिए हैं। आरोपी के खिलाफ पुलिस थाना चुवाड़ी में भारतीय दंड संहिता की धारा 376, 323, 506 और 34 के तहत मामला दर्ज किया गया है। याचिकाकर्ता ने इस मामले में हाईकोर्ट के समक्ष अग्रिम जमानत याचिका दायर की थी।
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अदालत के समक्ष दलील दी गई कि पुलिस ने पीड़ित की शिकायत पर उसके खिलाफ मामला दर्ज किया है, जबकि पीड़ित महिला ने उसे झूठे आरोप लगाकर फंसाने की कोशिश की है। याचिकाकर्ता और पीड़ित चंबा जिले के एक सामुदायिक स्वास्थ्य केंद्र में कार्यरत थे। इस दौरान उनके संबंध आपस में अच्छे हो गए और उन्होंने एक दूसरे को पैसे उधार भी देना शुरू कर दिया।
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याचिकाकर्ता और पीड़ित के संबंधों का पीड़ित के पति को पता चला और उसने याचिकाकर्ता के साथ मारपीट भी की। पुलिस में इस संबंध में प्राथमिकी भी दर्ज की। 29 जनवरी 2023 को पीड़ित ने पुलिस को शिकायत दी कि याचिकाकर्ता ने पहली अप्रैल 2021 और जुलाई 2021 में उसके साथ दुष्कर्म किया और साथ ही उसने याचिकाकर्ता को एक लाख बीस हजार रुपये का उधार भी दिया था।
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इसमें से केवल 80 हजार रुपये ही वापस किए। अदालत ने मामले से जुड़े रिकॉर्ड का अवलोकन करने पर पाया कि पीड़ित और याचिकाकर्ता के आपसी संबंध अच्छे थे। अदालत ने पाया कि शिकायतकर्ता के पास ऐसा कोई ठोस सबूत नहीं है कि याचिकाकर्ता उसे गुमराह करने की कोशिश कर रहा है।
अदालत ने अपने निर्णय में कहा कि पीड़ित एक शादीशुदा औरत है और साथ ही सरकारी कर्मचारी है, उसके पास पर्याप्त परिपक्वता है। इतने लंबे समय तक याचिकाकर्ता के खिलाफ कोई रिपोर्ट दर्ज न करने का उसके पास कोई ठोस कारण नहीं है। अदालत ने कहा कि मामले के विचारण में अदालत में लंबा समय लग सकता है, इसलिए बिना आरोप की सिद्धि से उसे कैद में रखना उचित नहीं है।