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Himachal CPS Case Hearing: सीपीएस के कानूनी दर्जे पर 20 मई को होगी सुनवाई
Fri, 10 May 2024 09:44 PM IST
अंकेश डोगरा
अमर उजाला ब्यूरो, शिमला
अमर उजाला ब्यूरो, शिमला
Published by: अंकेश डोगरा
Updated Fri, 10 May 2024 09:44 PM IST
सार
मुख्य संसदीय सचिव की नियुक्तियों के कानूनी दर्जे पर हिमाचल प्रदेश हाईकोर्ट में शुक्रवार को भी सुनवाई हुई। न्यायाधीश विवेक सिंह ठाकुर और न्यायाधीश विपिन चंद्र नेगी की खंडपीठ इस मामले को सुन रही है।अदालत अब 20 मई से लगातार इस मामले को सुनेगी।
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हिमाचल प्रदेश हाईकोर्ट
- फोटो : अमर उजाला
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विस्तार
हिमाचल प्रदेश हाईकोर्ट में मुख्य संसदीय सचिव की नियुक्तियों के कानूनी दर्जे पर शुक्रवार को तीसरे दिन भी सुनवाई हुई। सरकार की ओर से दलील दी गई कि सीपीएस पद को 75 वर्षों से दूसरे देशों में मान्यता दी गई है। सुप्रीम कोर्ट के वरिष्ठ अधिवक्ता दुष्यंत दवे ने अदालत को बताया कि मुख्य संसदीय सचिव का पद 70 वर्षों से भारत में और 18 वर्षों से हिमाचल में लागू है। वर्ष 2006 में हिमाचल प्रदेश में इस बाबत कानून बनाया गया है। उन्होंने टिप्पणी करते हुए कहा कि याचिकाकर्ता खुद सीपीएस पद पर रह चुके हैं। सीपीएस पद की सारी सुख-सुविधा लेने के बाद आज कानून गलत लग रहा है।
अधिवक्ता दुष्यंत दवे ने अदालत में सीपीएस के कानूनी पक्ष पर कई दलीलें पेश कीं। उन्होंने संविधान के अनुच्छेद 164 (1), 245, 309 और 321 का हवाला देते हुए कहा कि ये संघ और राज्य सरकार को अपने अतिरिक्त कार्यों के विस्तार करने की शक्तियां प्रदान करते हैं। उन्होंने अदालत को बताया कि संविधान में हर चीज विस्तार में नहीं लिख सकते। उसके लिए कन्वेंशन भी एक स्रोत हो सकती है, जैसे इस मामले में हुआ है। भारत में सीपीएस के पद की 1950 की कन्वेंशन को आधार बनाया गया है। न्यायाधीश विवेक सिंह ठाकुर और न्यायाधीश विपिन चंद्र नेगी की खंडपीठ इस मामले को सुन रही है। इस मामले में सरकार की बहस पूरी नहीं हुई है। अदालत अब 20 मई से लगातार इस मामले को सुनेगी।
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अधिवक्ता दुष्यंत दवे ने अदालत में सीपीएस के कानूनी पक्ष पर कई दलीलें पेश कीं। उन्होंने संविधान के अनुच्छेद 164 (1), 245, 309 और 321 का हवाला देते हुए कहा कि ये संघ और राज्य सरकार को अपने अतिरिक्त कार्यों के विस्तार करने की शक्तियां प्रदान करते हैं। उन्होंने अदालत को बताया कि संविधान में हर चीज विस्तार में नहीं लिख सकते। उसके लिए कन्वेंशन भी एक स्रोत हो सकती है, जैसे इस मामले में हुआ है। भारत में सीपीएस के पद की 1950 की कन्वेंशन को आधार बनाया गया है। न्यायाधीश विवेक सिंह ठाकुर और न्यायाधीश विपिन चंद्र नेगी की खंडपीठ इस मामले को सुन रही है। इस मामले में सरकार की बहस पूरी नहीं हुई है। अदालत अब 20 मई से लगातार इस मामले को सुनेगी।
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