कांगड़ा के सियासी दुर्ग को अभेद्य बनाने में जुटी कांग्रेस, खतरे में ये सीटें
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कांगड़ा के सियासी दुर्ग पर भाजपा की चौतरफा किलेबंदी को ध्वस्त करने के लिए कांग्रेस के सियासी रणनीतिकार सुशील कुमार शिंदे पहुंच गए हैं। सत्ता में वापसी के लिए भाजपा-कांग्रेस की नजर कांगड़ा जिले पर है। 68 विधानसभा क्षेत्रों वाले प्रदेश में सर्वाधिक 15 सीटें कांगड़ा में है।
भाजपा राष्ट्रीय अध्यक्ष अमित शाह ने तीन माह पहले पालमपुर से चुनावी शंखनाद कर संकेत दे दिए हैं कि पार्टी कांगड़ा के किले को मजबूत करना चाहती है। एक निर्दलीय विधायक को साथ लेकर भाजपा ने अपनी मंशा साफ कर दी है।
उधर, कांगड़ा से दस सीटें लाकर सत्ता में पहुंची कांग्रेस अपने गढ़ को बचाने में जुट गई है। मुख्यमंत्री वीरभद्र के लगातार दौरों के बाद अब प्रदेश प्रभारी सुशील कुमार शिंदे पांच दिवसीय प्रवास पर कांगड़ा पहुंच गए हैं। धर्मशाला को दूसरी राजधानी का दर्जा देने के बाद वहां सरकारी अमला बैठाने का मुद्दा फिर उठेगा।
50 प्लस की सफलता पूरी तरह से कांगड़ा पर निर्भर
वहीं, कांगड़ा की सियासत में बाली और मनकोटिया की पड़ोसी राजनीति के साथ गद्दी समुदाय जैसे स्थानीय मुद्दे के समाधान को लेकर शिंदे का प्रवास अहम माना जा रहा है। कांग्रेस के मिशन रिपीट तो भाजपा के मिशन 50 प्लस की सफलता पूरी तरह से जिला कांगड़ा पर निर्भर है।
राजधानी के मुद्दे के अलावा बीते तीन माह में कांगड़ा में राजनीतिक उथल पुथल मची हुई है। कांगड़ा से एक निर्दलीय मनोहर धीमान को भाजपा अपने पाले में लाकर कांग्रेस को झटका दे चुकी है, जबकि विधायक पवन काजल पर भी डोरे जा रहे हैं।
कांगड़ा के कद्दावरों में मंत्री जीएस बाली ने मुख्यमंत्री वीरभद्र सिंह विरोधी मेजर विजय सिंह मनकोटिया के साथ पड़ोसी धर्म निभाकर कांग्रेस को धर्मसंकट में डाल दिया है। पड़ोसी धर्म की सियासत में कई कांग्रेसियों को भाजपा के षड्यंत्र की गंध आ रही है।
कांग्रेस की ये सीटें हैं खतरे में
कांग्रेस विधायक यादवेंद्र गोमा के चाचा और चचेरे भाइयों का भाजपा का दामन थामना इसी सियासत का हिस्सा है। मुख्यमंत्री वीरभद्र सिंह लगातार कांगड़ा के दौरे कर रहे हैं, लेकिन गद्दी समुदाय को लेकर उनके एक बयान पर भड़की सियासत से जनपद की एक दर्जन सीटें प्रभावित हो सकती हैं।
भाजपा के रणनीतिकार मानते हैं कि कांगड़ा की अनदेखी की मायने सत्ता से बाहर होना है। प्रदेश प्रभारी मंगल पांडेय का कांगड़ा पर सर्वाधिक फोकस है। भाजपा की रणनीति भांप कर अब कांग्रेस प्रदेश प्रभारी सुशील कुमार शिंदे अपने 1993 के अनुभवों का सहारा ले रहे हैं। मुख्यमंत्री से लेकर तमाम मंत्री-विधायक भी धर्मशाला में मौजूद हैं।
कांगड़ा में संगठन को सक्रिय करने के साथ प्रदेश कांग्रेस और सरकार के बीच तालमेल बैठाना उनके लिए बड़ी चुनौती है। पांच दिनों में उन्हें बाली के साथ अन्य मंत्रियों की प्रचार में भूमिका तय करनी होगी। शीतकालीन राजधानी के मुद्दे पर कोई नया रणनीति शगूफा भी कांग्रेस ला सकती है।
गद्दी समुदाय के साथ नया गठजोड़ बनाने के लिए समुदाय के पार्टी में नेताओं का दायित्व भी बढ़ सकता है। अब देखना यह है कि पांच दिनों के मंथन के बाद कांग्रेस कौन सा फार्मूला लेकर आती है।