हिमाचल में क्षेत्रीय और जातीय संतुलन साधने को जयराम पर खेला दांव
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भाजपा ने विधानसभा चुनाव से पहले और बाद पार्टी में खुलकर दिखी खेमेबाजी पर जयराम ठाकुर को नेता सदन बनाकर खत्म करने का दांव खेला है। प्रदेश भाजपा में दशकों से हावी रहे धूमल, नड्डा और शांता खेमों की जगह अब नया युग शुरू होगा।
चुनाव के दौरान जिस तरह पार्टी को खेमेबाजी के चलते अपनी रणनीति बदलनी पड़ी, उसी का नतीजा है कि नया चेहरा प्रदेश को मिला है। चुनाव में नड्डा को आगे रखकर चल रही भाजपा को धूमल खेमे का आंतरिक विरोध झेलना पड़ा।
बिना चेहरे की रणनीति को पलट मतदान से नौ दिन पहले धूमल खेमे के दबाव में उनका नाम मुख्यमंत्री के तौर पर देना पड़ा। आखिरी समय में टिकट आवंटन में फेरबदल की वजह भी खेमे ही रहे।
बगावत, भितरघात और खेमेबाजी के तमाम समीकरणों के बावजूद पार्टी ने 44 सीटें जीतीं, लेकिन मुख्यमंत्री के लिए चली धड़ेबाजी से नाम तय करने में 6 दिन लग गए।
प्रदेश में आंतरिक हालात के साथ वर्ष 2019 लोकसभा चुनाव के लिहाज से मंडी जिले और ठाकुर को सत्ता सौंप कर पार्टी ने जातीय और क्षेत्रीय संतुलन बनाया है। 52 वर्षीय जयराम अगली पीढ़ी के नेता हैं, जिन्हें कुर्सी सौंप पार्टी ने कई समीकरण साध लिए हैं।
दिग्गजों के द्वंद्व में ऐसे बाजी मार ले गए जयराम
भाजपा के लिए तमाम समीकरणों को साधकर पसंद का चेहरा बतौर मुख्यमंत्री देने में लंबी माथापच्ची करनी पड़ी। पार्टी के उच्च पदस्थ सूत्रों के अनुसार धूमल के मुख्यमंत्री प्रत्याशी घोषित करने से पहले पार्टी नया चेहरा देना चाहती थी, लेकिन प्रदेश में खेमेबाजी के चलते आखिरी समय में धूमल को आगे किया गया।
धूमल की हार से पार्टी के लिए नया चेहरा देना आसान रहा। धूमल खेमा कमजोर पड़ा तो नड्डा कैंप की सक्रियता बढ़ गई। नड्डा कैंप ने कवरिंग कैंडिडेट के तौर पर जयराम का नाम चलाया गया। जयराम के पक्ष में तमाम समीकरणों को लाने के लिए संघ की भूमिका सबसे अहम रही। संघ ने उनकी निर्विवाद छवि के साथ संगठन में दिए योगदान से ग्राउंड तैयार किया।
जयराम का युवा होना उनके पक्ष में था। विधायकों में सुरेश भारद्वाज और राजीव बिंदल सरीखे नेताओं को गौण करने के लिए जयराम के मंडी संसदीय क्षेत्र से होना काम कर गया। भाजपा के फैसले पर प्रदेश में आम राय बनाने में सांसद शांता कुमार काम कर गए। धूमल के विरोधी माने जाने वाले शांता ने पहली बार चुने विधायकों से मुख्यमंत्री तय करने का मुद्दा उठाया, जिससे सांसद रामस्वरूप शर्मा, वीरेंद्र कश्यप भी साथ आ गए।
नड्डा को दौड़ से बाहर करने में यह दांव कारगर साबित हुआ। भले ही नड्डा ने कभी खुद को सीएम पद की रेस में नहीं बताया, लेकिन उनका कैंप उन्हीं के पक्ष में था। बिलासपुर विधायक सुभाष ठाकुर उनके लिए सीट खाली करने को भी तैयार हो गए। दिल्ली में नड्डा के नाम पर मंथन शुरू हो गया, लेकिन पर्यवेक्षकों का दो दिन तक शिमला में जुटाया गया फीडबैक जयराम के पक्ष में था। इस तरह से करीबी जयराम के लिए नड्डा भी तैयार हो गए।
मंडी-कुल्लू सधा, कांगड़ा-चंबा-शिमला भी साथ
जयराम के मुख्यमंत्री बनने से भाजपा ने वर्ष 2019 लोकसभा चुनाव के तमाम समीकरण साधे हैं। जयराम मंडी के सिराज विधानसभा हलके के हैं। शिमला, कुल्लू और मंडी जिले के 17 विधानसभा हलके इस संसदीय क्षेत्र में हैं।
वीरभद्र सिंह की पत्नी प्रतिभा सिंह यहां वर्ष 2014 में हारी, लेकिन विधानसभा के हिसाब से सबसे कमजोर प्रदर्शन भाजपा का इसी सीट से रहा। चारों संसदीय क्षेत्रों से केवल यहीं से अब तक कोई मुख्यमंत्री नहीं बना था।
दिग्गज पंडित सुखराम पहले ही भाजपा में आ चुके हैं। अब जयराम का मुख्यमंत्री बनना मास्टर स्ट्रोक साबित होगा। शांता जिस तरह से धूमल के विरोध और जयराम के पक्ष में रहे, उससे यह संकेत था कि कांगड़ा-चंबा ससंदीय क्षेत्र भी इस फैसले से खुद को जोड़ेगा।
दोनों संसदीय क्षेत्रों के साथ केंद्रीय मंत्री जेपी नड्डा के हमीरपुर संसदीय क्षेत्र से होने के गुणा भाग के बाद जयराम के नाम पर अंतिम मुहर लगाने में आसानी रही।
कांग्रेस के लिए बढ़ा दी चुनौती
जयराम के युवा चेहरे के बाद अब कांग्रेस के लिए युवा नेतृत्व को आगे लाने की चुनौती बन गई है। 83 वर्ष के वीरभद्र सिंह के अगले विधानसभा चुनाव नहीं लड़ने के एलान के बाद कांग्रेस को धूमल की जगह अब जयराम के मुकाबले का नेता तलाशना पड़ेगा।
सिराज विधायक के मुख्यमंत्री बनने से मंडी में कांग्रेस की समस्याएं बढ़ेंगीं। इसी सीट से वीरभद्र सिंह की पत्नी लोकसभा चुनाव लड़ती हैं।
इतना ही नहीं वीरभद्र और धूमल के बीच चलने वाली बदले की राजनीति पर नया चेहरा देने से विराम लगने की संभावना है। नया चेहरा देने से एंटी इनकम्बेंसी फैक्टर पर विराम लगेगा।