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Himachal: असिस्टेंट स्टाफ नर्सों की भर्ती पर लगी रोक हटाने से हाईकोर्ट का इन्कार, नई नीति पर भी उठाया सवाल

Wed, 08 Jul 2026 04:50 AM IST
Krishan Singh संवाद न्यूज एजेंसी, शिमला।
संवाद न्यूज एजेंसी, शिमला। Published by: Krishan Singh Updated Wed, 08 Jul 2026 04:50 AM IST
सार

सरकार की ओर से कोर्ट से आग्रह किया गया कि असिस्टेंट स्टाफ नर्सों की भर्ती पर लगी रोक हटाई जाए या फिर पहले घोषित रिजल्ट के अनुसार चयनित अभ्यर्थियों को नियुक्ति पत्र जारी करने की अनुमति दी जाए। 

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High Court refuses to lift stay on recruitment of Assistant Staff Nurses; raises questions about the new polic
हिमाचल प्रदेश हाईकोर्ट। - फोटो : अमर उजाला नेटवर्क

विस्तार

हिमाचल प्रदेश हाईकोर्ट में मंगलवार को आउटसोर्स भर्ती मामले में सुनवाई हुई। सरकार की ओर से कोर्ट से आग्रह किया गया कि असिस्टेंट स्टाफ नर्सों की भर्ती पर लगी रोक हटाई जाए या फिर पहले घोषित रिजल्ट के अनुसार चयनित अभ्यर्थियों को नियुक्ति पत्र जारी करने की अनुमति दी जाए। मुख्य न्यायाधीश गुरमीत सिंह संधावालिया और न्यायाधीश बिपिन चंद्र नेगी की खंडपीठ ने सरकार की मांग को ठुकराते हुए कहा कि प्रदेश में आउटसोर्स के तहत कितनी नियुक्तियां की गई हैं, पहले उसका डाटा दो सप्ताह में पेश किया जाए। खंडपीठ ने सरकार की नई नीति पर भी सवाल उठाया और इसे युवाओं से खिलवाड़ और शोषण पर आधारित बताया।

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अदालत में सरकार की ओर से हलफनामा दायर बताया गया कि असिस्टेंट स्टाफ नर्सिंग की भर्ती प्रक्रिया को और पारदर्शिता बनाने के लिए एक नीति बनाई है। नीति में बताया गया कि नियुक्तियां सिर्फ 5 साल के लिए की जाएंगी, लेकिन भविष्य में अपनी सेवाओं को वरिष्ठता और अन्य वित्तीय लाभों के लिए गणना की मांग नहीं कर सकेंगे। 25 हजार रुपये फिक्स मासिक पर रखा जाएगा। खंडपीठ ने टिप्पणी करते हुए कहा कि सरकार पिछले तीन वर्षों में आउटसोर्स पर की गई नियुक्तियों का रिकॉर्ड पेश नहीं कर पाई। सरकार ने कोर्ट से गुहार लगाई कि इस मामले में डाटा रिकॉर्ड में लाने के लिए अतिरिक्त समय दिया जाए, जिसे अदालत ने स्वीकार कर लिया। सुनवाई के दौरान प्रधान सचिव स्वास्थ्य एम सुधा और प्रधान सचिव वित्त देवेश कुमार सहित कई अन्य वरिष्ठ अधिकारी मौजूद रहे।

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याचिकाकर्ताओं ने पॉलिसी पर उठाया सवाल
सरकार ने असिस्टेंट स्टाफ नर्सों की पॉलिसी की रूपरेखा अदालत के समक्ष पेश की, जिस पर याचिकाकर्ताओं ने कड़ी आपत्तियां जताईं। उन्होंने कहा कि सरकार स्टाफ नर्सों के खाली पदों को भरने के बजाय एक नई नीति ला रही है। इससे न केवल स्वास्थ्य सेवाओं से खिलवाड़ किया जा रहा है बल्कि चयनित स्टाफ नर्सों के भविष्य के साथ भी भेदभाव होगा। सरकार को रिक्त पद भरने के लिए स्थायी बंदोबस्त करना चाहिए। पिछली सुनवाई में अदालत ने पाया था कि सरकार ने भर्ती नियमों में संशोधन किए बिना ही 6 नवंबर 2025 को एक नई नीति अधिसूचित कर दी और असिस्टेंट स्टाफ नर्स नामक एक नया काडर बनाकर 900 पद भरने की मंजूरी दे दी। मामले में अगली सुनवाई होगी।

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हिमाचल हाईकोर्ट की न्यायिक अधिकारियों को सख्त हिदायत
 प्रदेश उच्च न्यायालय ने राज्य के सभी न्यायिक अधिकारियों को बच्चों को यौन अपराधों से संरक्षण (पॉक्सो) कानून की धारा 35 के प्रावधानों का कड़ाई से पालन करने के सख्त निर्देश दिए हैं। हाईकोर्ट ने स्पष्ट किया है कि इन निर्देशों का अक्षरश पालन सुनिश्चित किया जाए ताकि मामलों की सुनवाई में कोई कोताही न हो। हिमाचल प्रदेश हाईकोर्ट के रजिस्ट्रार जनरल की ओर से सूबे के सभी न्यायिक अधिकारियों को इस संबंध में एक आधिकारिक पत्र जारी किया गया है। हाईकोर्ट ने एक मामले (रोहित बनाम हिमाचल प्रदेश राज्य- सीआर. एमपी (एम) न. 992/ 2026) की सुनवाई के दौरान पाया कि कई मामलों में निचली अदालतों द्वारा पॉक्सो एक्ट की धारा 35 के अधिदेश का पालन नहीं किया जा रहा है। अदालत ने इस बात पर चिंता जताई कि इस कानूनी प्रावधान के उल्लंघन के आधार पर हाईकोर्ट में लगातार जमानत याचिकाएं दायर की जा रही हैं।

कीरतपुर-नेरचौक-मनाली परियोजना के काम में तेजी लाने के निर्देश
प्रदेश हाईकोर्ट ने कीरतपुर-नेरचौक-मनाली परियोजना में हो रही देरी पर कड़ा रुख अपनाया है। मुख्य न्यायाधीश गुरमीत सिंह संधावालिया और न्यायाधीश जिया लाल भारद्वाज की खंडपीठ ने लोक निर्माण विभाग, एनएचएआई और निजी ठेकेदार कंपनियों को काम में तेजी लाने और जिम्मेदारी तय करने के निर्देश दिए हैं। जनहित याचिका की सुनवाई के दौरान कंपनी के निदेशक सुनील कुलकर्णी व्यक्तिगत रूप से पेश हुए। उन्होंने कोर्ट को बताया कि नेशनल हाईवे अथॉरिटी ऑफ इंडिया की ओर से कुछ ऐसी प्रतिबद्धताएं पूरी की जानी बाकी हैं, जो उनके निर्माण क्षेत्र की सीमा से बाहर है। इस वजह से काम रुका हुआ है और इसे ठीक करना एनएचएआई की जिम्मेदारी है। इस पर कंपनी के वकील ने कोर्ट से समय मांगते हुए कहा कि वे एक व्यापक हलफनामा दायर करेंगे। इसमें उन सभी दिक्कतों और एनएचएआई को भेजे गए अनुरोध पत्रों का पूरा रिकॉर्ड दिया जाएगा, ताकि लापरवाही बरतने वाले अधिकारियों की जिम्मेदारी तय की जा सके।

लोक निर्माण विभाग, मंडी के अधीक्षण अभियंता का हलफनामा पेश किया
सुनवाई के दौरान राज्य सरकार ने लोक निर्माण विभाग, मंडी के अधीक्षण अभियंता का हलफनामा पेश किया। इसमें बताया गया कि दियोड के पास क्षतिग्रस्त हुई 200 मीटर सड़क को बहाल कर दिया गया है। इस काम के लिए एनएचएआई की ओर से 5,51,13,973 स्वीकृत किए गए थे, जिसमें से 50 फीसदी राशि 2,75,56,986 जारी हो चुकी है। खंडपीठ ने निर्माण कार्य में सुस्ती के कारण पर्यटकों और स्थानीय जनता को पिछले 5 वर्षों से हो रही भारी परेशानी पर गहरी चिंता व्यक्त की थी।अदालत ने एनएचएआई और ठेकेदारों की सुस्त कार्यप्रणाली पर असंतोष जताते हुए उत्तरदाता कंपनी के प्रबंध निदेशक को व्यक्तिगत रूप से कोर्ट में तलब किया है। कोर्ट ने स्पष्ट किया कि मानसून की शुरुआत से पहले सभी संवेदनशील और क्षतिग्रस्त हिस्सों को हर हाल में दुरुस्त कर यातायात के अनुकूल बनाया जाए।

देरी से काम पूरा करने वाली कंपनी को माफी, लेकिन देना होगा 1 लाख जुर्माना
कोर्ट ने प्रतिवादी कंपनी द्वारा दायर अवमानना से जुड़े एक आवेदन पर भी फैसला सुनाया। इस कंपनी को जुलाई 2024 तक काम पूरा करने का समय दिया गया था, जिसे सुप्रीम कोर्ट ने अगस्त 2024 तक बढ़ाया था। चूंकि कंपनी ने बदले हुए प्रोजेक्ट स्कोप के तहत काम पूरा कर लिया है, इसलिए अवमानना की कार्रवाई को आगे बढ़ाने का कोई फायदा नहीं है।हाईकोर्ट ने टिप्पणियां करते हुए कहा कि हमारा मुख्य उद्देश्य यह सुनिश्चित करना था कि काम पूरा हो ताकि आम जनता को असुविधा न हो। चूंकि काम भले ही देरी से पूरा हो चुका है, इसलिए हम इस शर्त पर राहत दे रहे हैं कि कंपनी को एक महीने के भीतर हाईकोर्ट एम्प्लॉइज वेलफेयर एसोसिएशन फंड में एक लाख रुपये का जुर्माना जमा करना होगा।

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