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हिमाचल सरकार सभी एनएच और सड़कों से तीन माह में अवैध कब्जे हटाए, हाईकोर्ट ने दिए आदेश

Sat, 24 Jul 2021 09:55 PM IST
Krishan Singh अमर उजाला नेटवर्क, शिमला
अमर उजाला नेटवर्क, शिमला Published by: Krishan Singh Updated Sat, 24 Jul 2021 09:55 PM IST
सार

 कोर्ट ने कहा कि कब्जा धारकों की ओर से अपनी आजीविका के लिए सड़क किनारे बनाए अस्थायी निर्माणों को अनदेखा नहीं किया जा सकता। सार्वजनिक संपत्ति पर कब्जे हटाने को कोर्ट कर्तव्य बाध्य है। 

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High Court orderded Himachal govt to remove illegal occupation from all NH and roads in three months
हिमाचल हाईकोर्ट - फोटो : अमर उजाला

विस्तार

 हाईकोर्ट ने राज्य के सभी नेशनल, स्टेट हाईवे और सड़कों से तीन माह में अवैध कब्जे हटाने के हिमाचल प्रदेश सरकार को आदेश दिए। न्यायाधीश तरलोक सिंह चौहान और सत्येन वैद्य की खंडपीठ ने आदेशों की अनुपालना के लिए मुख्य सचिव को सुनिश्चित करने को कहा है। कोर्ट ने कहा कि कब्जा धारकों की ओर से अपनी आजीविका के लिए सड़क किनारे बनाए अस्थायी निर्माणों को अनदेखा नहीं किया जा सकता।

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सार्वजनिक संपत्ति पर कब्जे हटाने को कोर्ट कर्तव्य बाध्य है। अदालत ने कहा कि अवैध कब्जाधारियों को दयाभाव के आधार पर नहीं बख्शा जा सकता। ठियोग क्षेत्र के नरेल निवासी हरनाम सिंह उर्फ  रिंकू चंदेल की याचिका को खारिज करते हुए अदालत ने यह आदेश पारित किए। याची ने कोर्ट से गुहार लगाई थी कि सड़क किनारे बनाए गए उसके ढाबे को न गिराया जाए, क्योंकि इससे वह अपने परिवार का पेट पालता है। लोक निर्माण विभाग ने उसे नोटिस जारी कर ढाबे को हटाने का आदेश दिया था।
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इस आदेश को याची ने हाईकोर्ट के समक्ष चुनौती दी। दलील दी गई कि याची अपनी रोजी-रोटी कमाने के लिए ढाबा चलाता है। इस ढाबे के कारण न को यातायात रुकता है और न किसी अन्य को कोई परेशानी होती है। दलील दी गई थी कि नेशनल हाईवे पर अवैध निर्माण करने वाला वह अकेला नहीं है, बल्कि प्रदेश भर में लोगों ने सड़क किनारे अवैध निर्माण किए हैं और अपनी आजीविका कमा रहे हैं।
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इसलिए उसके अवैध निर्माण को हटाने के बारे में दिए गए आदेशों को रद्द किया जाए। अदालत ने मामले से जुड़े तमाम रिकॉर्ड का अवलोकन करने के बाद पाया कि कब्जाधारियों द्वारा अपनी आजीविका के लिए सड़क किनारे बनाए गए अस्थायी निर्माणों को अनदेखा नहीं किया जा सकता। मामले पर 25 अक्तूबर को आदेशों को सुनिश्चित करवाने बाबत फिर सुनवाई होगी।

सात माह से गर्भवती महिला को हाईकोर्ट ने दी अग्रिम जमानत

हिमाचल प्रदेश हाईकोर्ट ने मादक पदार्थों की तस्करी में षड्यंत्र रचने के आरोपों का सामना करने वाली सात माह की गर्भवती महिला को अग्रिम जमानत पर रिहा करने के आदेश जारी किए। न्यायमूर्ति अनूप चिटकारा ने अग्रिम जमानत याचिका स्वीकार करते हुए कहा कि मादक पदार्थों की तस्करी दंडनीय अपराध है, लेकिन एक गर्भवती महिला का अपराधी होना अजन्मे बच्चे के लिए पूरी उम्र घातक साबित हो सकता है, यदि उसका जन्म जेल में हो। जेल में जन्म लेने पर बच्चे को तब तब मानसिक तनाव का सामना करना पड़ सकता है जब तक उसके जन्म की बात उठेगी। ऐसा आघात उसे सामाजिक जीवन जीने नहीं देगा। अपराध में संलिप्त या आरोपित गर्भवती महिलाओं को भी जेल में पौष्टिक आहार तो मिल सकता है परंतु मानसिक तनाव से मुक्ति नहीं।

चारदीवारी में बंद रहने से गर्भवती महिला को मानसिक तनाव उत्पन्न हो सकता है। जेल में जन्म देना मां को गहरा आघात पहुंचा सकता है। कोर्ट ने कहा कि गर्भवती महिलाओं की सजा को बच्चे के जन्म से पहले और उसके बाद लगभग एक साल तक के लिए टालने से समाज पर कोई फर्क नहीं पड़ जाएगा। गर्भावस्था काल, डिलीवरी टाइम और जन्म देने से कम से कम एक साल तक महिला को तनावमुक्त वातावरण की जरूरत होती है। हर महिला का मातृत्वकाल में गरिमा पूर्ण जीवन जीने का हक है। गर्भवती महिलाओं को जेल नहीं बेल की जरूरत है। अदालतों को गर्भवती महिलाओं के मातृत्व समय में उनकी पावन स्वतंत्रता बहाल करनी चाहिए। अपराध कितना भी बड़ा हो, उन्हें कम से कम ऐसे समय में अस्थायी बेल तो दी ही जानी चाहिए।

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