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पंचायत ने BPL परिवारों को सुनाया ये फरमान, हाईकोर्ट ने दिया नोटिस

Wed, 24 May 2017 09:28 AM IST
ब्यूरो/अमर उजाला, शिमला
ब्यूरो/अमर उजाला, शिमला Updated Wed, 24 May 2017 09:28 AM IST
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High court notice to himachal govt
हिमाचल हाईकोर्ट

हिमाचल हाईकोर्ट ने कांगड़ा जिला की रक्कड़ पंचायत द्वारा बीपीएल परिवारों के बच्चों को निजी स्कूलों में न पढ़ाने के फरमान के खिलाफ राज्य सरकार को नोटिस जारी किया है। कार्यवाहक मुख्य न्यायाधीश संजय करोल और न्यायाधीश अजय मोहन गोयल की खंडपीठ ने बैजनाथ के रमेश कुमार द्वारा मुख्य न्यायाधीश के नाम लिखे पत्र पर संज्ञान लेने के बाद यह आदेश पारित किए। 

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प्रार्थी रमेश कुमार ने दलील दी है कि इस तरह का फरमान जारी करना असंवैधानिक है। हर परिवार को अपने बच्चे अच्छे स्कूलों में पढ़ाने की स्वतंत्रता है। बीपीएल परिवार पर इस तरह की पाबंदी लगाने की शक्ति पंचायत के पास नहीं है। प्रार्थी ने न्यायालय से गुहार लगाई है कि इस मुद्दे को लेकर कानूनी तौर पर जरूरी निर्देश जारी करें।

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दागी पुलिस अफसरों की तैनाती पर फंसी सरकार

High court notice to himachal govt

प्रदेश हाईकोर्ट ने दागी पुलिस अधिकारियों को संवेदनशील पदों पर तैनात करने के मामले में मुख्य सचिव सहित गृह सचिव, डीजीपी और एसपी ऊना को नोटिस जारी कर चार सप्ताह के भीतर जवाब तलब किया है। मामले पर सुनवाई चार जुलाई को होगी। 

कार्यवाहक मुख्य न्यायाधीश संजय करोल और न्यायाधीश अजय मोहन गोयल की खंडपीठ ने मुख्य न्यायाधीश के नाम लिखे पत्र पर संज्ञान लेते हुए यह आदेश पारित किए। 

पुलिस कर्मी द्वारा लिखे पत्र में बताया गया है कि दागी पुलिस अधिकारियों को संवेदनशील पदों पर तैनाती दी जा रही है जबकि कानूनन ऐसे अधिकारियों व कर्मचारियों को ना तो संवेदनशील पदों पर और न ही उनके अपने जिलों में तैनाती दी जा सकती है।

पत्र में डीजीपी और एसएसपी को इसके लिए जिम्मेवार ठहराते हुए बताया गया है कि ऊना जिला में दागी हेड कांस्टेबल विजय कुमार

और एचएचसी शेर बहादुर ने अपने तबादले छठी आईआरबी से रद करवा कर खुद की तैनाती पुलिस चौकियों में करवा ली। पुलिस कर्मी ने मामले की जांच करने और ऐसे कर्मियों की तैनाती बटालियन में करने की गुहार लगाई है।

सहकारिता ट्रिब्यूनल गठित करे प्रदेश सरकार: हाईकोर्ट

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हाईकोर्ट ने प्रदेश सरकार को सहकारी समितियों से जुड़े मामलों के निपटारे करने के  लिए सहकारिता ट्रिब्यूनल का गठन करने के निर्देश दिए हैं। कोर्ट ने खेद जताया कि मौजूदा प्रणाली मामलों के निपटारे और अपने फैसलों की अनुपालन में नाकाम साबित हुई है। न्यायाधीश तरलोक सिंह चौहान ने अशोक कुमार की ओर से दायर मामले का निपटारा करते हुए यह आदेश पारित किए।

याचिका में दिए तथ्यों के अनुसार प्रार्थी अशोक कुमार ने वर्ष 1986 से इंदौरा कृषि सहकारिता समिति में बतौर सचिव ज्वाइन किया। उसे वर्ष 2008 में विभागीय जांच के पश्चात सेवाओं से बर्खास्त कर दिया गया था। इस बर्खास्तगी के खिलाफ  उसने जनवरी 2008 में रजिस्ट्रार कोऑपरेटिव सोसाइटी के समक्ष अपील दायर की।

7 अप्रैल 2008 को रजिस्ट्रार ने उसकी सेवाओं को बहाल करने के आदेश पारित कर दिए थे, लेकिन इंदौरा कोआपरेटिव सोसाइटी ने प्रार्थी की ज्वाइनिंग स्वीकार नहीं की। प्रार्थी को रजिस्ट्रार के आदेशों की अनुपालन करवाने के लिए मजबूरन हाईकोर्ट आना पड़ा। हाईकोर्ट ने मामले को निपटाते हुए खेद जताया कि सहकारिता समिति का रजिस्ट्रार अपने आदेशों की अनुपालन करवाने में शक्तिहीन है जिस कारण प्रदेश में सहकारिता ट्रिब्यूनल का गठन करना अति आवश्यक हो गया है।

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सहकारिता समिति की मैनेजिंग कमेटी को भंग करने के आदेश पारित

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 कोर्ट ने हिमाचल प्रदेश सहकारिता अधिनियम की धारा 108 के अंतर्गत तथा सहकारिता नियम 132 के तहत सहकारिता ट्रिब्यूनल खोलने के आदेश जारी किए। कोर्ट ने इंदौरा कोआपरेटिव सोसाइटी की ओर से प्रार्थी की बहाली में बरती गई कोताही के दृष्टिगत वर्ष 2008 के बाद की मेनेजिंग कमेटी के सभी सदस्यों की सदस्यता को खत्म करने के आदेश दिए और अगले 5 साल तक उन्हें किसी अन्य समिति की सदस्यता लेने से भी बात से रोक दिया। 

कोर्ट ने वर्ष 2008 से आज तक रहे कोऑपरेटिव सोसाइटी के प्रत्येक सदस्य पर 20000 पर कॉस्ट लगाने के आदेश भी पारित किए। कोर्ट ने यह कॉस्ट मुआवजे के तौर पर प्रार्थी को दिए जाने को कहा है क्योंकि उसे बेवजह परेशान किया गया है। कोर्ट ने इंदौरा कृषि सहकारिता समिति की मैनेजिंग कमेटी को भी भंग करने के आदेश पारित करते हुए इस समिति पर प्रशासक की नियुक्ति कर दी है जो कि रजिस्ट्रार की ओर से प्रार्थी की बहाली वाले आदेशों की अनुपालन भी सुनिश्चित करेगा।

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