नौकरी मिली नहीं, पत्थर तोड़ बूढ़े मां-बाप को पाल रहा दिव्यांग बेटा
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कुदरत ने ऐसा सितम ढाया कि पोलियो ने दोनों टांगों से अपाहिज बना दिया, लेकिन फिर भी चढ़ियार के प्रदीप ने हिम्मत नहीं हारी और जमा दो तक शिक्षा प्राप्त की। घर की माली हालत के चलते आगे पढ़ नहीं सका तो परिवार चलाने के लिए मनरेगा में पत्थर तोड़ने का काम करने लगा। सरकार के दर कई बार रोजगार के लिए गुहार लगाई, लेकिन हर बार आश्वासनों का झुनझुना ही मिला।
सरकार की उपेक्षा से टूट चुके चढ़ियार के मतियाल गांव निवासी 38 वर्षीय प्रदीप को 92 वर्षीय बुजुर्ग पिता प्रताप सिंह और 77 वर्षीय मां का पालण-पोषण करना कठिन हो गया है। बैजनाथ में पत्रकार वार्ता में प्रदीप ने अपनी दर्द भरी दास्तां बयां की। उसने कहा कि वह पांच बार सीएम के पास जाकर रोजगार देने की गुहार लगा चुका है, लेकिन रोजगार देना तो दूर सरकार की तरफ से सहानुभूति का एक पत्र तक नहीं मिला। कई राजनेताओं के पास गया, लेकिन अब तक आश्वासन ही मिले।
1850 रुपये पेंशन में कैसे चले गुजारा
प्रदीप ने कहा कि मनरेगा में दोनों हाथों से पत्थर तोड़ने का कार्य करता हूं, जिसकी दिहाड़ी से घर में दो वक्त की रोटी का जुगाड़ होता है। लेकिन मनरेगा में लगातार काम नहीं मिलता। उसने कहा कि वह कभी भी भीख नहीं मांगेगा, लेकिन सरकार से एक अदद स्थायी रोजगार चाहता है।
फिलहाल जयसिंहपुर के समाजसेवी संजय शर्मा ने प्रदीप की आर्थिक सहायता की है। लेकिन उसका कहना है कि अपने बूढ़े मां-बाप संग अपने भरण-पोषण के लिए वह अपने आत्म सम्मान के साथ कोई रोजगार चाहता है। सरकार कब उसकी पुकार सुनेगी।
दिव्यांग प्रदीप और उसके बुजुर्ग माता-पिता को मात्र 1850 रुपये सरकार की तरफ से मासिक पेंशन के रूप में मिलते हैं। प्रदीप का कहना है कि यह राशि उसके बीमार चल रहे माता-पिता की दवाइयों पर ही खर्च हो जाती है। मनरेगा में काम न मिले तो दो वक्त की रोटी जुटाना मुश्किल हो जाता है। प्रदीप अपनी मां का इलाज करवाना चाहता है, लेकिन रोजगार के बिना वह असहाय है।