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दूसरों को जीवन देने वाला 'घराट' अब खुद मोहताज है

Sun, 18 Jan 2015 01:52 PM IST
सुरेश शांडिल्य/अमर उजाला, शिमला
सुरेश शांडिल्य/अमर उजाला, शिमला Updated Sun, 18 Jan 2015 01:52 PM IST
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Grat in Himachal are on the verge of ending

सदियों से पहाड़ी इलाकों में पनचक्की से चलने वाले घराट लोगों को पौष्टिक आटा देकर जीवन प्रदान करते थे। मगर अब घराट संस्कृति आखिरी सांसे गिन रही है।

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हिमाचल में घराट संस्कृति अंतिम सांसें गिन रही है। आटा पीसने के सैकड़ों घराट (पनचक्की) उजड़ चुके हैं। जो बचे हैं, वे अधिकतर समय तालाबंद रहते हैं। घराटों के उजड़ने का सबसे बड़ा कारण आधुनिकता की दौड़, बेतहाशा बिजली परियोजनाएं और सेब फसल की ओर बढ़ती रुचि भी है।
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घराटों में पिसा आटा भले ही पौष्टिक हो लेकिन लोग खड्डों-नालों में जाने के बजाय घर के नजदीक बिजली से चलने वाली चक्की में आटा पिसाते हैं। दूसरा नदी-नालों पर बेतहाशा बिजली परियोजनाएं लगने से इतना पानी ही नहीं बचा है कि घराट निरंतर चल सकें। अपर हिमाचल में सेब भी घराटों को उजाड़ने का एक कारण बना है।
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न घराट बचे न घराटी

Grat in Himachal are on the verge of ending

सेब की पैदावार के लिए शिमला, कुल्लू और किन्नौर जिलों के लोगों ने गेहूं, मक्की, जौ, कोदा, बाथू आदि फसलें बीजना लगभग छोड़ दी हैं। ऐसे में इन क्षेत्रों में भले ही पानी हो, लेकिन न घराट बचे न घराटी। घराट चलाने वालों ने अपना व्यवसाय बदल लिया है। नई पीढ़ी इसमें रुचि नहीं ले रही।

इन घराटों को छोटी बिजली परियोजनाओं में बदलने की कई बार मांग उठी, निजी स्तर पर कुछ प्रयास भी हुए, लेकिन हिमाचल सरकार के पास इनके संरक्षण की कोई योजना नहीं है। यहां तक कि कितने घराट उजड़े और कितने बचे हैं, इसकी जानकारी भी सरकार के पास नहीं है।

कैसे चलता है घराट
घराट किसी खड्ड या नाले के किनारे कूहल से निकाले पानी की ग्रेविटी से चलते हैं। ये आम तौर पर डेढ़ मंजिला घर की तरह होते हैं। ऊपर की एक मंजिल में बड़ी चट्टानों से काटकर बनाए पहिये लकड़ी या लोहे की बड़ी-बड़ी फिरकियों पर पानी के वेग से घूमते हैं। इससे आटा पिसता है।

ये हैं घराट की खासियत

Grat in Himachal are on the verge of ending

क्या है खासियत
घराटों में खूब महीन आटा पीसा जाता है। इससे बनी रोटियों का स्वाद भी चक्की के आटे से अलग होता है। इसे पौष्टिक माना जाता है। पहाड़ी लोग इलेक्ट्रिक चक्की में पीसे आटे के बजाय परंपरागत घराट में हुई पिसाई को पहले खूब पसंद करते रहे हैं।

अब वो बात नहीं रही: चंदेल
ठियोग के रैणा गांव से नीचे गिरि नदी से निकाली कूहल से घराट चलाने वाले घराटी रमेश चंदेल का कहना है कि उनका घराट लगभग बंद ही है।

अब घराट में पीसने को इतना अनाज ही नहीं मिल पाता है कि गुजारा हो सके। अब वो बात नहीं रही। ढांगवी गांव के जाने-माने बागवान रामलाल चौहान ने बताया कि सेब से अच्छी आमदन के बाद अब लोगों ने अनाज उगाना बंद कर दिया है।

पजौल गांव के प्रगतिशील बागवान प्रताप चौहान और बसमोल गांव के युवा बागवान कुलदीपकांत शर्मा का कहना है कि अनाज उगाना और पीसना अब घाटे का सौदा हो गया है।

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