पांच साल बीते, हिमाचल सरकार की इस योजना को लगा ग्रहण
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हिमाचल के मंदिरों में सदियों से संचित सोना पिघलाने की योजना खटाई में पड़ गई है। कानून बने पांच साल हो गए लेकिन न सोने के सिक्के बने और न बिस्कुट। हिमाचल के 36 प्रमुख मंदिरों में एक क्विंटल, 30 किलो, 908 ग्राम सोना है लेकिन महज पांच मंदिर ही बिस्कुटों या सिक्कों के रूप में अपना आधा सोना बेचने को तैयार हो पाए हैं।
प्रसिद्ध मंदिर ज्वालाजी, बज्रेश्वरी, चामुंडा, बालासुंदरी और चिंतपूर्णी ही सोना पिघलाना चाहते हैं। इनसे संबंधित ट्रस्ट और जिला प्रशासन भारत सरकार के मिनरल कारपोरेशन के साथ एमओयू साइन करेंगे। हिमाचल प्रदेश हिंदू सार्वजनिक धार्मिक संस्थान पूर्त
विन्यास अधिनियम 1984 में वर्ष 2010 और 2011 में संशोधन किया गया था, जिसमें मंदिरों में सदियों से जमा सोने को पिघलाने की व्यवस्था की गई। इसके नियम हाल ही में बने हैं। मंत्रिमंडल की मंजूरी के बाद अब जिला प्रशासन और संबंधित ट्रस्टों को ही अपने स्तर पर एमओयू साइन करने को कहा गया है।
ज्वालाजी मंदिर में है इतना सोना
कांगड़ा जिले के ज्वालाजी मंदिर में 17 किलो, 92 ग्राम सोना है। बज्रेश्वरी माता मंदिर में साढ़े 10 किलो, चामुंडा नंदिकेश्वर मंदिर में 4 किलो 973 ग्राम सोना है। ऊना के चिंतपूर्णी माता मंदिर में भी काफी सोना है। अन्य मंदिरों में नयनादेवी मंदिर में 54 किलो, बाबा बालक नाथ मंदिर दियोटसिद्ध में 23 किलो 113 ग्राम और बालासुंदरी मंदिर त्रिलोकपुर में साढ़े 12 किलो सोना है।
क्या करेंगे पिघलाए गए सोने का
10 फीसदी सोने को मंदिर से जुड़ी विभिन्न गतिविधियों में इस्तेमाल करेंगे। 20 फीसदी सोने को स्टेट बैंक ऑफ इंडिया की गोल्ड बांड स्कीम में निवेश किया जाएगा। 20 फीसदी सोने को मंदिरों में ही रिजर्व रखा जाएगा। 50 फीसदी सोने को बिस्कुटों या सिक्कों में बदला जाएगा। इसे मंदिरों में आने वाले सैलानियों और अन्य इच्छुक भक्तों को बेचा जाएगा।
संबंधित जिला प्रशासन और ट्रस्टों को इस बारे में मिनरल्स कारपोरेशन के साथ एमओयू साइन करने के निर्देश दिए गए हैं। मंत्रिमंडल से मंजूर नियमों से भी उन्हें सूचित करा दिया गया है। पांच मंदिर इसके लिए तैयार हैं। बहुत जल्द सोना पिघलाकर सिक्के बनने शुरू हो जाएंगे। -अनुराधा ठाकुर, सचिव, भाषा एवं संस्कृति, हिमाचल सरकार