'मंत्री की नाकामी की वजह से मनरेगा में पिछड़ा हिमाचल'
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पूर्व ग्रामीण विकास एवं पंचायतीराज मंत्री जयराम ठाकुर ने कहा है कि पंचायती राज मंत्री की विभाग और मनरेगा में पकड़ न होने के कारण प्रदेश में मनरेगा पिछड़ रहा है। उन्होंने कहा कि मनरेगा मांग आधारित योजना है। लेबर बजट के आधार पर प्रदेश सरकार की ओर से मांग किए गए बजट को केंद्र सरकार कभी नकार नहीं सकती, बशर्ते प्रदेश सरकार मनरेगा के अंतर्गत हो रहे सभी कार्यों की समीक्षा रिपोर्ट समय पर केंद्र के समक्ष जमा करवाता रहे।
अनिल शर्मा की ओर से इसका दोषारोपण भाजपा व केंद्र सरकार लगना गलत है। ठाकुर ने कहा कि मनरेगा के तहत केंद्र से मिलने वाला बजट अमूमन 5 किस्तों में मिलता है। वित्तीय वर्ष 2014-15 के दौरान हिमाचल प्रदेश को पांच किस्तों में 355.42 करोड़ रुपये प्राप्त हुए थे, जिसमें 5 फ रवरी, 2015 को अंतिम किस्त के रूप में 69.43 करोड़ रुपये मिले थे।
प्रदेश को अभी तक मिल चुके हैं 351.10 करोड़ रुपये
वित्तीय वर्ष 2015-16 में मनरेगा के तहत अभी तक कुल चार किस्तों में प्रदेश को 351.10 करोड़ रुपये मिल चुके हैं और फरवरी महीने की एक किस्त आनी बाकी है। केंद्र सरकार की ओर से इस योजना के तहत धन का आवंटन दो चरणों की प्रक्रिया पूरी करने के पश्चात होता है। पहले चरण में कुल लेबर डिमांड के पश्चात बजट जारी किया जाता है तथा दूसरे चरण में चल रहे विकास कार्यों की समीक्षा के पश्चात धन का आवंटन होता है।
उन्होंने कहा कि वर्ष 2013-14 में मनरेगा के तहत 5,72,136 परिवारों ने रोजगार की मांग की थी। वर्ष 2014-15 में 4,99,166 परिवारों ने रोजगार मांगा था, परंतु वर्ष 2015-16 में घटकर यह संख्या 4,31,232 परिवारों की रह गई। वर्ष 2015-16 में मात्र 3,880 अनुसूचित जाति परिवारों को 100 दिन का रोजगार उपलब्ध करवाने में यह सरकार कामयाब हो पाई है।
इसके अतिरिक्त केवल 2 प्रतिशत लोग ही 100 दिन का रोजगार पाने का लक्ष्य पूरा कर पाए हैं। मंत्री अपनी नाकामयाबी का ठिकरा भाजपा और केंद्र सरकार के सिर फोड़ने की कोशिश कर रहे हैं।