Shimla: पूर्व स्वास्थ्य निदेशक डॉ. अजय कुमार गुप्ता को सुप्रीम कोर्ट से नहीं मिली राहत
स्वास्थ्य विभाग के पूर्व निदेशक डॉ. अजय कुमार गुप्ता को सुप्रीम कोर्ट से भी कोई राहत नहीं मिली है। शीर्ष अदालत ने अजय कुमार गुप्ता की याचिका खारिज कर दी है।
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कोरोना काल के दौरान आवश्यक उपकरणों की खरीद फरोख्त में हेराफेरी के आरोपों में स्वास्थ्य विभाग के पूर्व निदेशक डॉ. अजय कुमार गुप्ता को सुप्रीम कोर्ट से भी कोई राहत नहीं मिली है। शीर्ष अदालत ने अजय कुमार गुप्ता की याचिका खारिज कर दी है। अदालत ने स्पष्ट किया कि यदि आत्मसमर्पण करता है और नियमित जमानत के लिए आवेदन करता है तो उसकी याचिका का निपटारा नियमानुसार जल्दी किया जाए। हिमाचल प्रदेश हाईकोर्ट ने पूर्व निदेशक डॉ. अजय कुमार गुप्ता की अग्रिम जमानत याचिका गत 9 दिसंबर को खारिज कर दी थी। न्यायाधीश विवेक सिंह ठाकुर ने नामित आरोपी की जमानत खारिज करते हुए कहा था कि आपातकाल जैसी स्थिति में भी आम जनता के जीवन से खिलवाड़ करने के संगीन जुर्म के आरोपी को जमानत पर रिहा करना उचित नहीं है। अदालत ने अपने निर्णय में कहा था कि कोरोना जैसी महामारी के दौरान स्वास्थ्य विभाग के जिम्मेदार अधिकारी को जीवन रक्षक मशीनों के लेनदेन करते समय सजग रहना चाहिए था।
लोगों की जान बचाने के लिए उचित कदम उठाने के बजाय वह अपने हित को सफल बनाने में लगा रहा। हाईकोर्ट के इस निर्णय को डॉ. अजय कुमार गुप्ता ने एसएलपी के माध्यम से सुप्रीम कोर्ट के समक्ष चुनौती दी थी। मामले के अनुसार राज्य सतर्कता विभाग ने गुप्ता को कोरोना काल के दौरान आवश्यक उपकरणों की खरीद फरोख्त घोटाले में नामजद किया है। अभियोजन पक्ष ने आरोपी के खिलाफ मामला दर्ज किया है कि उसने कोरोना योद्धाओं के लिए मास्क, दस्ताने, थर्मल स्कैनर और पीपीई किट जैसे उपकरणों की खरीद फरोख्त में हेराफेरी की है। राज्य सतर्कता विभाग ने स्वास्थ्य विभाग के पूर्व निदेशक डॉ. अजय कुमार गुप्ता और बलराम के बीच आपसी बातचीत के ऑडियो की जांच की थी। जांच में पाया गया कि आरोपी ने जीवन रक्षक मशीनें खरीदने के लिए 30 लाख रुपये की राशि स्वीकृत की थी। इस राशि में उसने 85 हजार रुपये प्रति मशीन कमीशन तय की थी। राज्य सतर्कता विभाग ने आरोपी के खिलाफ रिश्वत लेने संबंधी पुख्ता सबूत जमा किए और उसके खिलाफ 17 सितंबर 2022 को प्राथमिकी दर्ज की थी।
प्रदेश में ठोस कचरा सयंत्र स्थापित न करने के मामले की सुनवाई 10 जनवरी निर्धारित
हिमाचल प्रदेश में ठोस कचरा संयंत्र स्थापित न करने के मामले की सुनवाई 10 जनवरी निर्धारित की गई है। पर्यावरण मानकों के आधार पर ठोस कचरा संयंत्र स्थापित न करने पर हाईकोर्ट ने कड़ा संज्ञान लिया है। अदालत ने सभी प्रोजेक्ट अधिकारियों को संयुक्त रिपोर्ट दायर करने के आदेश दिए हैं। बता दें कि अदालत के समक्ष हिमाचल के अलग-अलग हिस्सों से अपशिष्ट प्रबंधन, ठोस अपशिष्ट स्थापित करने के लिए स्थल विवाद और अनुपचारित सीवरेज और ठोस अपशिष्ट की रिहाई से जुड़ी याचिकाएं दर्ज की गई हैं। अदालत ने इन मामलों में प्रमुख सचिव (वन), प्रधान सचिव (उद्योग), प्रधान सचिव (कृषि), प्रधान सचिव (जल शक्ति विभाग), प्रधान सचिव (स्वास्थ्य), प्रधान सचिव (ग्रामीण विकास और पंचायतीराज) और हिमाचल पथ परिवहन निगम को प्रतिवादी बनाया है। प्रदेश में ठोस अपशिष्ट प्रबंधन और इसके कार्यान्वयन पर अदालत को बताया गया कि हिमाचल प्रदेश 59 शहरी समूह के साथ भारत का सबसे अच्छा शहरीकृत राज्य है, लेकिन कचरे की कम मात्रा भी गंभीर स्वास्थ्य समस्याएं पैदा कर सकती हैं।
बद्दी में 970 करोड़ रुपये की लागत से बनने वाले ठोस अपशिष्ट प्रबंधन को स्थापित करने के लिए कोई कदम नहीं उठाए गए हैं। नगर निगम धर्मशाला में कचरे को अनुपचारित तरीके से निष्पादन किया जा रहा है। इसी तरह सोलन में भी कचरे से निपटने के लिए कोई विशेष प्रावधान नहीं बनाया गया है। किन्नौर में एक करोड़ रुपये की लागत से कचरे के निष्पादन के लिए मशीन लगाई गई है, लेकिन कई वर्षों से यह बेकार पड़ी है। हिमाचल में 29 नगर परिषद और 5 नगर निगम है। कहीं भी कचरे का नियमानुसार निष्पादन नहीं किया जा रहा है। मामले की गंभीरता को देखते हुए अदालत ने सभी प्रोजेक्ट अधिकारियों को आदेश दिए है कि वे प्रतिवादियों से समन्वय करे और अदालत के समक्ष विस्तृत और संयुक्त रिपोर्ट दायर करें।